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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

এম নজরুল ইসলাম: প্রতিক্রিয়াশীল চক্র এখনো তৎপর

এম নজরুল ইসলাম: বাংলাদেশের রাজনৈতিক ইতিহাসের একটি কালো দিন ১৬ জুলাই। ২০০৭ সালের এই দিনে জননেত্রী শেখ হাসিনাকে গ্রেপ্তার করে তত্ত্বাবধায়ক নামে আসা তৎকালীন চেপে বসা সরকার। বাংলাদেশের রাজনৈতিক আকাশকে সত্যিকার অর্থেই দুর্যোগের মেঘে আচ্ছন্ন করে ফেলেছিল। সেই গ্রেপ্তার-নাটক দেখেছে বাংলাদেশের মানুষ। তত্ত্বাবধায়ক সরকারের নিরাপত্তারক্ষীদের অপ্রয়োজনীয় অথচ অতিনাটকীয়তায় ‘সেই বার্তা’ রটে যেতে সময় লাগেনি। ঢাকায় তখন রাত পৌনে ৪টা। যৌথ বাহিনী ঘিরে ফেলল সুধা সদন—জননেত্রী শেখ হাসিনার বাসভবন। অপ্রত্যাশিত এক ঘটনার খবরে আশপাশের বাড়িঘরের জানালা খুলতে থাকল একটা একটা করে। টেলিভিশন খুলতেই সবাই দেখতে পেল সেই দৃশ্য।

অস্ট্রিয়ার রাজধানী ভিয়েনায় তখন মাঝরাত। হঠাৎ সেল ফোনটা বেজে উঠল। কানে দিতেই ভেসে এলো আওয়ামী লীগের তৎকালীন পরিবেশবিষয়ক সম্পাদক, বর্তমানে তথ্য ও সম্প্রচার মন্ত্রী ড. হাছান মাহ্মুদের কণ্ঠস্বর। বললেন, ‘এইমাত্র আপাকে গ্রেপ্তার করে নিয়ে যাচ্ছে।’ এটুকু বলেই ছেড়ে দিলেন তিনি। মাত্র একটি বাক্যেই কথা শেষ। আমি বিস্মিত, বিমূঢ়। সঙ্গে সঙ্গে অস্ট্রিয়ায় বসবাসরত বঙ্গবন্ধুর আদর্শের সৈনিক ও অনুসারীদের ফোন করে ঘুম থেকে জাগিয়ে নেত্রীর গ্রেপ্তারের খবর দিই এবং সকাল ৮টায় অস্ট্রিয়ার রাজধানী ভিয়েনায় স্টার্ড পার্কে শেখ হাসিনার গ্রেপ্তারের প্রতিবাদ ও মুক্তির দাবিতে বিক্ষোভ সমাবেশ আহ্বান করি আমরা। ফোন করি লন্ডনে অবস্থানরত বঙ্গবন্ধুর কনিষ্ঠ কন্যা শেখ রেহানাকে। ফোনের ওপারে তাঁর কণ্ঠেও হতাশা। আমি আমাদের সিদ্ধান্তের কথা জানাই তাঁকে। তিনি আমাদের উৎসাহ দেন। তাত্ক্ষণিকভাবে ‘শেখ হাসিনা মুক্তি সংগ্রাম পরিষদ’ গঠনের পরামর্শ দেন। ইউরোপের বিভিন্ন দেশের নেতাদের সঙ্গে যোগাযোগ হয়। পরদিন অস্ট্রিয়া সময় সকাল ৮টায় বিপুলসংখ্যক বাঙালি নারী-পুরুষ উপস্থিত হয় বিক্ষোভ সমাবেশে। অস্ট্রিয়াপ্রবাসী সর্বস্তরের বাঙালিদের নিয়ে ‘শেখ হাসিনা মুক্তি সংগ্রাম পরিষদ’ গঠিত হয়। নেত্রী গ্রেপ্তারের পর থেকে তাঁর মুক্তির দাবিতে প্রতি মাসে ভিয়েনায় চারটি করে বিক্ষোভ সমাবেশ হয়ে আসছিল। আমরা গণস্বাক্ষর, অস্ট্রিয়ান পার্লামেন্টের সামনে মানববন্ধন, গণ-অনশন কর্মসূচিও পালন করেছি।

বঙ্গবন্ধুকন্যা ও আওয়ামী লীগ সভাপতি জননেত্রী শেখ হাসিনা ও তাঁর পরিবারকে সমূলে উৎপাটনের ষড়যন্ত্র একেবারেই নতুন নয়। সাহসী রাজনীতির পারিবারিক ঐতিহ্য ও সংগ্রামের ইতিহাসকে মুছে ফেলে দেওয়ার কুৎসিত-নির্মম ও ভয়াবহ চক্রান্ত করেছিল প্রতিক্রিয়াশীল চক্র। নিষ্ঠুর রাজনৈতিক প্রতিহিংসাপরায়ণতা ও চক্রান্তের জাল বিছিয়েছিল গোপনে! সংকীর্ণ রাজনীতির হীনম্মন্যতার ছদ্মাবরণে জননেত্রী শেখ হাসিনার ভাবমূর্তি নষ্ট করার চেষ্টা করেছিল। সেই পরিকল্পিত ব্যবস্থা প্রচলনের উদ্দেশ্যে তারা প্রাথমিক পর্যায়ে কিছু পদক্ষেপ গ্রহণ করে, যা ছিল নিতান্তই লোক-দেখানো। স্বচ্ছ নির্বাচন অনুষ্ঠানের ওয়াদা করেই তো তারা এসেছিল এবং দুর্নীতি, ঘুষ, কালো টাকা, মাস্তানি উত্খাতের অঙ্গীকার করেছিল। ফলে জরুরি আইন জারির মাধ্যমে শুদ্ধ ও পূর্ণাঙ্গ ভোটার লিস্ট প্রণয়ন আর ‘লেভেল প্লেয়িং ফিল্ড’ নির্মাণের কাজগুলো নির্বিঘ্নে সম্পন্ন করতে চাইল। ঘোষণা দিল রাজনৈতিক দলগুলোর মধ্যে গণতন্ত্র চর্চা ও সংস্কার সাধন করতে হবে। শুরু হলো রাজনীতি ও ব্যবসায় দুর্নীতিবাজদের পাকড়াও করা। ক্ষমতাদম্ভে উন্মাদ, রাজনীতির দলীয় পদ দখল করা অনভিজ্ঞ যুবক, বেশুমার অপকীর্তির নায়কদের ধরপাকড় করা হলো। সাধারণ মানুষ থেকে রাজনীতিসচেতন জনগণ পর্যন্ত সবার মধ্যেই সরকার আস্থার সঞ্চার করেছিল। এমনকি আওয়ামী লীগের অনেকেই গ্রেপ্তার হলেও তাঁরা ভেবেছিলেন যদি এমন অপকীর্তির সঙ্গে চাঁদাবাজি, ঘুষ নেওয়া কিংবা এমন কোনো অপরাধের সঙ্গে সত্যিই গ্রেপ্তারকৃতরা জড়িত থেকে থাকেন, তাহলে তাঁদের সুষ্ঠু বিচার হোক, আপত্তি নেই। কিন্তু অযথা হয়রানি যেন না হয় কেউ। বিএনপির বহুজনই গ্রেপ্তার হলেন দুর্নীতি, ক্ষমতার অপব্যবহারের জন্য। কিন্তু মানুষকে তাজ্জব করে এ সরকার জামায়াতের কাউকেই গ্রেপ্তার করল না। এসব কি কোনো চক্রান্তের অংশ ছিল?

শেখ হাসিনাকে গ্রেপ্তারের বিরুদ্ধে প্রতিবাদ গড়ে তুলে মুক্ত করতে তাঁর যুক্তরাষ্ট্রপ্রবাসী ছেলে সজীব ওয়াজেদ জয় এবং যুক্তরাজ্যপ্রবাসী ছোট বোন শেখ রেহানা টেলিফোনে সব সময় আমাদের সঙ্গে যোগাযোগ করেছেন। বিভিন্ন নির্দেশনা ও উপদেশ দিয়েছেন। তাঁরা ছিলেন প্রত্যয়দৃপ্ত। তাঁরা জানতেন সব ষড়যন্ত্রের জাল ভেদ করে বাংলার মানুষের ভালোবাসায় সিক্ত শেখ হাসিনা একদিন ঠিকই ফিরে আসবেন তাঁর বিশ্বাসের মানুষের কাছে।

২০০৮ সালের জুন মাসে তিনি মুক্তি পেলেন। আর একই বছর নির্বাচন অনুষ্ঠানের ভেতর দিয়ে তো পাল্টে গেল পুরো চালচিত্র। সামনে থেকে নেতৃত্ব দিয়ে তিনি বাংলাদেশকে পৌঁছে দিয়েছেন এক অনন্য উচ্চতায়। ২০০৯ সালে তিনি দ্বিতীয়বারের মতো প্রধানমন্ত্রীর দায়িত্ব নিলেন। সেই দিনের সঙ্গে যদি আজকের দিনের তুলনা করি, তাহলে তো রীতিমতো অবাকই হতে হয়। ২০০৮-০৯ বছরে জিডিপির আকার ছিল মাত্র ১০৩.৫ বিলিয়ন মার্কিন ডলার। ২০১৯-২০ সালে তা ৩৩০.২ বিলিয়ন মার্কিন ডলারে উন্নীত হয়েছে। ২০০৮-০৯ বছরে রপ্তানি আয়ের পরিমাণ ছিল ১৫.৫৭ বিলিয়ন ডলার। আর ২০১৮-১৯ বছরে তা ৪০.৫৪ বিলিয়ন ডলারে বৃদ্ধি পেয়েছে। বৈদেশিক মুদ্রার রিজার্ভ ২০০৮-০৯ অর্থবছরে ৭.৪৭ বিলিয়ন মার্কিন ডলার থেকে বৃদ্ধি পেয়ে বর্তমানে ৪৪.০৩ বিলিয়ন ডলারে উন্নীত হয়েছে। ২০০১ সালে দেশে দরিদ্রের হার ছিল ৪৮.৯ শতাংশ এবং হতদরিদ্রের হার ছিল ৩৪.৩ শতাংশ। ২০১৯ সালে দরিদ্রের হার কমে দাঁড়িয়েছে শতকরা ২০.৫ শতাংশ এবং হতদরিদ্রের হার ১০.৫ শতাংশ। ২০০৯-১০ সালে বিদ্যুতের স্থাপিত ক্ষমতা ছিল পাঁচ হাজার ২৭১ মেগাওয়াট। বর্তমানে বিদ্যুৎ উৎপাদন সক্ষমতা ২৪ হাজার ৪২১ মেগাওয়াটে উন্নীত এবং বিদ্যুৎ সুবিধাভোগী জনসংখ্যা ৪৭ থেকে ৯৯ শতাংশে উন্নীত হয়েছে। বাংলাদেশ বিশ্বে ধান উৎপাদনে তৃতীয় এবং মাছ-মাংস, ডিম, শাক-সবজি উৎপাদনেও স্বয়ংসম্পূর্ণ। অভ্যন্তরীণ মুক্ত জলাশয়ে মাছ উৎপাদন বৃদ্ধির হারে বাংলাদেশ দ্বিতীয় স্থানে এবং ইলিশ উৎপাদনকারী ১১ দেশের মধ্যে বাংলাদেশের অবস্থান প্রথম। অষ্টম পঞ্চবার্ষিক পরিকল্পনা গ্রহণ, পদ্মা সেতু, মেট্রো রেল, এলিভেটেড এক্সপ্রেসওয়ে, কর্ণফুলী টানেল, রূপপুর পারমাণবিক বিদ্যুৎ প্রকল্প, মহেশখালী-মাতারবাড়ী সমন্বিত উন্নয়ন প্রকল্পসহ বেশ কিছু মেগাপ্রকল্প বাস্তবায়ন, ১০০টি বিশেষ অর্থনৈতিক অঞ্চল, দুই ডজনের বেশি হাই-টেক পার্ক এবং আইটি ভিলেজ নির্মিত হচ্ছে। উন্নয়ন অভিযাত্রায় ‘ডিজিটাল বাংলাদেশ’-এর সুবিধা আজ শহর থেকে প্রান্তিক গ্রাম পর্যায়েও বিস্তৃত হয়েছে। ‘বঙ্গবন্ধু স্যাটেলাইট’-এর সুবিধা কাজে লাগিয়ে তথ্য-প্রযুক্তি খাতে এক বৈপ্লবিক পরিবর্তন আসবে।

দেশ আমাদের। জনগণই দেশের প্রাণশক্তি। সেই জনগণকে রক্ষা ও সুসংহত করেই রাষ্ট্রীয় অখণ্ডতা ও স্বাধীনতা-সার্বভৌমত্ব আমাদেরই রক্ষা করতে হবে। দেশটিকে অন্ধকারের দিকে নিয়ে যেতে প্রতিক্রিয়াশীল চক্র তৎপর। ঘাপটি মেরে আছে রাজনৈতিক অপশক্তিও। এই অবস্থা থেকে উত্তরণের একমাত্র পথ প্রগতিশীল গণতান্ত্রিক শক্তির ঐক্য ও মুক্তিযুদ্ধের পক্ষশক্তির সম্মিলিত প্রয়াস। জনগণের জয় হোক।

লেখক : সভাপতি, সর্ব ইউরোপিয়ান আওয়ামী লীগ এবং অস্ট্রিয়াপ্রবাসী লেখক, মানবাধিকারকর্মী ও সাংবাদিক

সূত্র : কালের কণ্ঠ

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