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প্রচ্ছদ

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ধর্ষণের শিকার ৬৬ শতাংশই কন্যাশিশু

কালের কণ্ঠ: পাঁচ বছরের তরীকে বাসায় রেখে কাজে যান মা ফাতেমা। দুপুরে বাসায় ফিরে দেখেন তরী নেই। অনেক খোঁজাখুঁজির পর খাটের নিচেই পাওয়া গেল তরীকে। নিথর। রক্তাক্ত। চারতলার বাসায় এক বা একাধিক ‘হায়েনা’ তরীকে ধর্ষণের পর হত্যা করে খাটের নিচে রেখে চলে যায়। গত ২৭ জুনের ঘটনা এটি। শিশু সুমাইয়া রাতে টিভি দেখে ঘুমাতে গিয়েছিল। ২০ জুন সকালে তার ক্ষতবিক্ষত লাশ পাওয়া যায় বাড়ির পাশের খড়ের পালার নিচে। শুধু তরী কিংবা সুমাইয়া নয়, চলতি বছরের গত ছয় মাসে সারা দেশে এমন অন্তত ৩৭৮ জন কোমলমতি শিশুকে ধর্ষণ করা হয়েছে। ধর্ষণের পর হত্যা করা হয়েছে ১২ জন শিশুকে। একই সময় ধর্ষণের শিকার হয়েছেন ১৯৮ জন নারী। ধর্ষণের পর হত্যার শিকার হয়েছেন চারজন নারী।

ওপরের উপাত্ত বাংলাদেশ মহিলা পরিষদের প্রতিবেদন থেকে নেওয়া। তাদের তথ্যানুযায়ী, চলতি বছরের প্রথমার্ধ জানুয়ারি থেকে জুন পর্যন্ত প্রায় এক হাজার ৭৯৪ জন নারী ও কন্যাশিশু নির্যাতনের ঘটনা ঘটেছে। এর মধ্যে ধর্ষণের শিকার হয় ৫৭৬ জন। তাদের মধ্যে ৪১ জন কন্যাশিশু ও ৬৪ জন নারী একাধিক ব্যক্তি বা সংঘবদ্ধ ধর্ষণের শিকার হন।

এদিকে জানুয়ারি থেকে জুন এই সময়ে ধর্ষণের চেষ্টা করা হয়েছে ৫১ কন্যাশিশু ও ৩০ নারীকে। তাঁরা কোনোমতে ধর্ষকের হাত থেকে বেঁচে ফিরেছেন। এ ছাড়া বিভিন্ন জায়গায় যৌন নিপীড়নের শিকার হয়েছেন ২৪ কন্যাশিশু ও ১২ নারী। অপহরণের শিকার হয়েছেন ৮০ কন্যাশিশু ও ১৫ জন নারী। পারিবারিক, সামাজিকসহ বিভিন্ন কারণে ৬২ জন ফুটফুটে কন্যাশিশু ও ১৫৯ জন নারীকে হত্যা করা হয়েছে। আরো ৬৩ কন্যাশিশু ও ১৬২ জন নারীর রহস্যজনক মৃত্যু হয়েছে—যার কারণ জানা যায়নি। ধারণা করা হচ্ছে, এদের বড় অংশই ধর্ষণের পর হত্যার শিকার হয়েছে। এ ছাড়া পাশবিক নির্যাতনের পর মানসিক অপমানবোধ থেকে আত্মহত্যার পথ বেছে নিয়েছেন অন্তত ৬৮ জন কন্যাশিশু ও নারী। এ ছাড়া ৩২ জন নারী যৌতুকের কারণে হত্যার শিকার হন। সাইবার অপরাধের শিকার হয়েছেন ৩০ জন কন্যাশিশু ও নারী। বাংলাদেশ মহিলা পরিষদ প্রথম সারির ১৩টি জাতীয় দৈনিকে প্রকাশিত সংবাদের ওপর ভিত্তি করে নারী ও কন্যাশিশু নির্যাতনের এই প্রতিবেদন তৈরি করে।

আইনমন্ত্রী আনিসুল হক বলেন, ‘নারী ও শিশু নির্যাতন এবং ধর্ষণের মামলাগুলো পুলিশ তদন্ত করছে। প্রতিবেদন দিলেই আমার মন্ত্রণালয় দ্রুত বিচারের ব্যবস্থা করবে। এ ছাড়া সঠিক ও ন্যায়বিচারের মাধ্যমে ধর্ষক, নারী ও শিশু নির্যাতনকারীদের শাস্তি নিশ্চিত করা হবে।’

তিনি আরো বলেন, ‘নারী ও শিশু নির্যাতন দমনে আমাদের এখন যে আইন আছে, এই আইনেই দ্রুত বিচার প্রক্রিয়া সম্পন্ন করে আসামিদের সর্বোচ্চ সাজা নিশ্চিত করা যাবে। কন্যাশিশু ও নারী নির্যাতনকারীদের আইনের ফাঁক গলে বেরিয়ে যাওয়ার কোনো সুযোগ নেই।’

ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের ক্রিমিওনোলজি বিভাগের প্রতিষ্ঠাতা চেয়ারম্যান ও সমাজবিজ্ঞানী অধ্যাপক জিয়া রহমান অনুসন্ধান সেলকে বলেন, ‘আমরা এখন যুগসন্ধিক্ষণ পার করছি। আমরা না সনাতন, না আধুনিক; এক কথায় কোনো যুগের মধ্যেই আমরা পড়ি না। আমরা সনাতনি যুগ থেকে বেরিয়ে গেছি বলা হলেও সেই মূল্যবোধ রয়ে গেছে, আবার সনাতনি যুগের অনুশাসনগুলো নেই। আবার আধুনিক যুগের দিকে যাচ্ছি বললেও আধুনিক মূল্যবোধ ও সুযোগ-সুবিধা সমাজে নেই। এসব কারণেই কন্যাশিশু ধর্ষণসহ সমাজে বিকৃত যৌনাচার বেড়ে গেছে।

এই সমাজবিজ্ঞানী আরো বলেন, ‘আমাদের পুঁজিবাদী সমাজ সোশ্যাল মিডিয়াসহ অনেক নেগেটিভ সাইটে পর্নোগ্রাফি উন্মুক্ত করে দিয়েছে। কিন্তু নৈতিক শিক্ষা বা যৌন শিক্ষার কোনো ব্যবস্থা করেনি। এই কারণে যৌনাচারকে বিকৃতভাবে গ্রহণ করা হচ্ছে।’ জিয়া রহমান মনে করেন দেশে নারী ও শিশু নির্যাতনবিরোধী আইন থাকলেও এর সঠিক প্রয়োগ নিয়ে যথেষ্ট সন্দেহ আছে। অভিযোগ আছে ধর্ষণের মামলার আসামি থেকে সুবিধা নিয়ে পুলিশ তার পক্ষ নেয়। আসামি রাজনৈতিক কিংবা আর্থিক দিক থেকে শক্তিশালী হলে হয়তো আইনের আওতায়ই আসে না।’

বাংলাদেশ মহিলা পরিষদের সভাপতি ফৌজিয়া মুসলেম বলেন, ‘ধর্ষিত হয়ে থানায় গেলে পুলিশ মামলা নিতে চায় না। কারণ ধর্ষক সব সময় রাজনৈতিক, অর্থনৈতিক কিংবা সামাজিকভাবে প্রভাবশালী হয়। এ কারণেও দেশে ধর্ষণ বাড়ছে।’ গত ছয় মাসে মোট নারী নির্যাতনের ৩৫ শতাংশেরও বেশি হলো ধর্ষণ উল্লেখ করে তিনি বলন, ‘এখানে নারীর প্রতি সংহিসতার মূল হাতিয়ার হয়ে দাঁড়াচ্ছে ধর্ষণ। আসলে আমরা দিন দিন একটি অসুস্থ ও অস্বাভাবিক সমাজ ও রাষ্ট্রের দিকে এগিয়ে যাচ্ছি। কারণ যে ধর্ষণ করছে তার মানসিক অসুস্থতা ও অস্বাভাবিকতা রয়েছে।’

‘এমন একটা অস্বাভাবিক জনগোষ্ঠী আমাদের দেশ কিংবা সমাজকে কিভাবে সামনের দিকে এগিয়ে নিয়ে যাবে?’

প্রশ্ন করেন ফৌজিয়া মুসলিম। তাঁর মতে, কন্যাশিশু ও নারীর সুরক্ষা নিশ্চিত করতে হলে আইনকে কাগজে-কলমে না রেখে প্রাতিষ্ঠানিক রূপ দিতে হবে। নারী-পুরুষ সবার নিরাপদ কর্মক্ষম পরিবেশ তৈরি করতে হবে। সমাজ যত দিন মনে করবে নারী একটি ভোগের বস্তু তত দিন ধর্ষণ বন্ধ হবে না।

দেশের কোর্ট ও জেলগুলোরও আধুনিকায়ন হয়নি উল্লেখ করে সমাজবিজ্ঞানী জিয়া রহমান বলেন, ‘জেল খাটার সময়টাকে আসামির সাজা হিসেবে গণনা করা হয়, কারেকশন বা সংশোধন হিসেবে দেখা হয় না। আসামিদের কাউন্সিলিং করে স্বাভাবিক জীবনে ফেরানোর কোনো উদ্যোগ নেই। এ কারণে জেল থেকে বেরিয়ে আবারও নারী ও শিশু ধর্ষণে জড়িয়ে যাচ্ছে অপরাধীরা।’

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