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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

শ্রমিকহত্যার বিরুদ্ধে জনতাকে প্রতিবাদমুখর হতে হবে: রুহিন হোসেন প্রিন্স

ভূঁইয়া আশিক রহমান: [২] সাক্ষাৎকারে বাংলাদেশের কমিউনিস্ট পার্টির (সিপিবি) অন্যতম সম্পাদক রুহিন হোসেন প্রিন্স বলেছেন, অধিকাংশ কারখানা এখন মৃত্যুফাঁদ, পুঁজিপতিবান্ধব সরকার শ্রমিকদের স্বার্থরক্ষা করবে তা দূরাশা। একজন মানুষ কাজ করে তার মৌলিক চাহিদা পূরণ করার জন্য। বেঁচে থাকার জন্য। কিন্তু এদেশের মানুষ কি তার মৌলিক চাহিদাগুলো পূরণ করতে পারছে? পাচ্ছে কি নিরাপদ ও স্বাস্থ্যকর একটি সুন্দর পরিবেশ? কতোগুলো কারখানা আইএলও কনভেশন বা আমাদের দেশের শ্রম আইন মেনে পরিচালিত হয়ে থাকে? মালিকেরা কি মানেন আইন? মানেন না। তার ফলে কী হয়Ñ তার অসংখ্য উদাহরণ আমাদের সামনে আছে। তাজরীন ফ্যাশনের অগ্নিকাÐের কথা আমরা ভুলে যাইনি, আমরা রানা প্লাজার কথাও জানি। কিন্তু মালিকদের দায়িত্ববোধ জেগেছে কি এসব ঘটনার পর? কতোটুকু জেগেছে সেই দায়িত্ববোধ? বর্তমান ব্যবস্থায় এটা আশা করার কোনো কারণ নেই। কেননা নারায়ণগঞ্জের সেজান জুসের কারখানা বড় উদাহরণ হয়ে সামনে এসেছে।

[৩] নারায়ণগঞ্জের সেজান জুসের কারখানায় আগুনে পুড়ে ৫০ জনেরও বেশি মানুষ মারা গেছে। তারা আর মানুষ নেই, কয়লা হয়ে গেছে! এসব মানুষের মৃত্যুর ঘটনা আমাদের সামনে আবারও পরিষ্কার করে দিলো, কিছু কারখানা ছাড়া অধিকাংশ কারখানাই শ্রমিকের জন্য মৃত্যুফাঁদ। কারণ কারখানাগুলো কোনো আইন-কানুনের ধার ধারে না। কারখানা মালিকেরা যেন একটা অলিখিত দায়মুক্তি নিয়ে নিয়েছেন। সরকার এই দায়মুক্তি দিয়ে চলেছে। এর ফলাফল যা হওয়ার তাই হচ্ছে।

[৪] আইন না মেনে সেজান জুস কারখানায় শিশুদের কাজ করানো হয়েছে। কারখানায় কোনো শ্রম আইন মানা হয়নি। কারখানার ভেতরে যে পরিবেশ রাখার কথা, সেটা করা হয়নি। খোঁজ নিলে দেখা যাবে, যে অগ্নিনির্বাপক যন্ত্র থাকার কথা, তাও নেই। যন্ত্র যা আছে তা ব্যবহারের লোক নেই। বরং আমরা দেখলাম, অগ্নিকাÐের মতো ঘটনা ঘটলে মানুষ যাতে নিরাপদে বের হতে পারে, সেই ব্যবস্থা না রেখে শ্রমিকদের তালাবদ্ধ করে আটকে রাখা হয়েছিলো! ভাবা যায়, একটি সভ্য দেশে এমন ঘটনা ঘটতে পারে। ন্যূনতম মানবিকতাসম্পন্ন মানুষ কি এমন ব্যবস্থায় শ্রমিকদের রাখতে পারেন? পারেন না। বেশির ভাগ শিল্পমালিকেরা মানবিক মানুষ নন, তারা শুধু মুনাফা বোঝেন, ক্ষমতাসীনদের তুষ্ট করা বোঝেন। তাই তো শ্রমিকদের তালা দিয়ে রাখার মতো ঘটনা ঘটাতে পারেন।

[৫] কারখানায় অগ্নিকাÐ বা দুর্ঘটনার ঘটার পর নানান কর্মকাÐ দেখি আমরা। তদন্ত কমিটি গঠিত হয়। ঘটনার প্রকৃত চিত্র উদ্ঘাটনে নানান তোরজোর লক্ষ্য করা যায়। কিন্তু কাজের কাজ কি কিছু হয়? নারায়ণগঞ্জ ঘটনার পর পরিদর্শকেরা বলছেন, তারা একাধিকবার কারখানা পরিদর্শন করতে চেয়েছিলেন। কিন্তু তাদের পরিদর্শনের অনুমোদন দেওয়া হয়নি। এটা কি হতে পারে? এটা কি কোনো দায়িত্বশীল মানুষের কথা হতে পারে? তার মানে আমাদের যে আইন আছে, তা যে অকার্যকর, সেজান জুস কারখানার অগ্নিকাÐে আবারও প্রমাণিত হলো।

[৬] শ্রমিকেরা শ্রম দিয়ে মালিককে পুঁজিপতি করে। অথচ মালিকেরা তাদের প্রতি থাকেন অমানবিক। কোনো দায়ই নেন না তারা। আমরা তাজরীন ফ্যাশনের ভয়াবহ অগ্নিকাÐের কথা জানি। এ ধরনের বহু ঘটনা ঘটেছে এদেশে, কিন্তু ঘটনা ঘটার পর মালিকেরা দায়মুক্তি পেয়ে যান। তাজরীন ফ্যাশনের মালিককে গ্রেপ্তার করা হয়েছিলো, কিন্তু তিনি এখন দেশের বাইরে। তাই তো সেজান জুসের কারখানায় অগ্নিকাÐের পর তার মালিক কর্মচারীদের প্রতি দায়িত্বশীল আচরণ না করে ঔদ্ধত্য দেখালেন। বললেন, ‘শ্রমিক মৃত্যুর দায় আমার নয়, কারখানায় কাজ করলে মৃত্যু হবেই’!

[৭] কীভাবে একজন মালিক শ্রমিকদের মর্মান্তিক মৃত্যুর পর এমনটি বলতে পারলেন? কারণ দেশে যতোটুকু আইন আছে, তার প্রয়োগ করা হয় না। অর্থাৎ এ ধরনের ঘটনার পর দায়ীদের শাস্তি দেওয়া হয় না বলেই বারবার শ্রমিকেরা আগুনে পুড়ে ছাঁই হয়। বিচার হয় না। আমার মনে হয়, আমাদের যতোটুকু আইন আছে, তা প্রয়োগ করতে হবে। এ ধরনের ঘটনায় যারাই দোষী তাদের দৃষ্টান্তমূলক শাস্তি নিশ্চিত করতে হবে। নিহত-আহত শ্রমিকদের উপযুক্ত ক্ষতিপূরণ দিতে মালিককে বাধ্য করতে হবে।

[৮] যারা কারখানা বা শিল্পপ্রতিষ্ঠান করবেন, তারা যেন পুরোপুরি শ্রম আইন মেনে করেন। আইএলও কনভেনশন অনুযায়ী শ্রমিকদের প্রতি যে রকম আচার হওয়ার কথা, সেটা করতে হবে। আইনের কঠোর প্রয়োগ দরকার, মালিকদের আইন মেনে চলার জন্য যদি সরকার যথাযথ ভ‚মিকা পালন না করে, তাহলে আগুনে পুড়ে শ্রমিক মৃত্যুর ঘটনা ঘটতেই থাকবে।

[৯] আগুনে পুড়িয়ে শ্রমিক হত্যায় বিরোধী রাজনৈতিক সংগঠনগুলোর কোনো দায় নেই। এখানে তো কোনো শ্রমিক ইউনিয়ন করার অধিকার দেওয়া হয় না। সরকার যদি নিয়ম অনুযায়ী কারখানায় নীতিনিষ্ঠদের শ্রমিকদের ইউনিয়ন করার সহায়তা দিতো, তাহলে আজকে এগারো-বারো বছরের শিশুকন্যা বা পুত্রকে নিয়োগ দিতে পারতো না কারখানা মালিকেরা। শ্রম আইন অনুযায়ী শ্রমিকেরা কাজ করতে পারতেন। কিন্তু সরকারের উদাসীনতার কারণে মালিকেরা শিশুদের নিয়োগ দিতে পারছে। এটা দেখার কেউ নেই। এর পুরো দায়-দায়িত্ব সরকারকেই নিতে হবে। বিরোধী রাজনৈতিক সংগঠনগুলোর দায় এখানে কোনোভাবেই নেই। আমরা আমাদের দায়িত্ব পালন করছি। বারবার সরকারকে সতর্ক করছি, অনিয়ম-দুর্নীতিবাজদের বিরুদ্ধে কঠোর হওয়ার জন্য দাবি জানাচ্ছি। যতোটুকু দায়িত্ব পালন করার কথা, আমরা সোচ্চার থেকে সেটা পালন করে যাচ্ছি।

[১০] লুটেরা ব্যবসায়িক মালিকদের সমর্থক সরকার। এর ফলে শুধু আইএলও কনেভশনই নয়, দেশের আইন অনুযায়ী ন্যূনতম ইউনিয়ন করারও যে অধিকার আছে, সেটাও মালিকেরা করতে দেন না। কিন্তু এতে সরকার মালিকদের বাধ্যও করে না। বরং কোনো একটা ঘটনা ঘটলে, মালিকরা যা বলেন, সরকার তাদের সঙ্গে সুর মিলিয়ে কথা বলে। তাই বলে আমরা কিন্তু বসে নেই। মেহনতি মানুষ ও শ্রমিকদের অধিকার আদায়ে প্রতিনিয়ত কথা বলে যাচ্ছি। নানান হুমকি-ধামকি, হয়রানি কিংবা গ্রেপ্তার সত্তে¡ও শ্রমিকদের অধিকার নিশ্চিতে প্রচেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে শ্রমিক সংগঠনগুলো। রাজপথে কণ্ঠ সোচ্চার রাখছি আমরা।

[১১] শ্রমিকদের অধিকার সুনিশ্চিত করার জন্য কারখানাগুলোতে শ্রমিকদের ট্রেড ইউনিয়ন করার অধিকার দিতে হবে। আইএলও কনভেনশন অনুযায়ী এবং দেশীয় আইন-কানুন মেনে যাতে কারখানাগুলো চলে, সরকারকেই তা নিশ্চিত করতে হবে। এটা সরকারেরই দায়িত্ব। কিন্তু দুঃখের বিষয়, দুঃখের সঙ্গে বলতে হয়Ñ সরকার নিজে যেমন নাগরিকের অধিকার নিশ্চিতে যথাযথ দায়িত্ব পালন করছে না, অন্যদেরও করতে দেওয়া হচ্ছে না। ভয়ের সংস্কৃতি দিয়ে নানান ভাবে কণ্ঠ রোধের চেষ্টা করা হচ্ছে।

[১২] বিদেশি ক্রেতারা মাঝেমধ্যে চাপ দেয় শিল্পকারখানাগুলোকে। মালিকেরা তখন কিছুটা নড়েচড়ে বসেন। কারখানার পরিবেশ উন্নত করেন। নিয়ম-কানুন মেনে চলার কাজটা করেন অনেক সময়। সবাই কি শ্রমিকবান্ধব আচরণ করেন? কিছু কিছু শিল্পপ্রতিষ্ঠানের মান উন্নত করা আছে, সেসব কারখানা নিয়ম-কানুন মেনে চলে, কিন্তু অন্যরা মানেন না। বিদেশি ক্রেতাদের চাপ নয়, আমাদের কথা হচ্ছে, সরকার তার দায়িত্ব ঠিকভাবে পালন করবে কিনা। আর সরকার ব্যর্থ হলে আমরা জনগণ রুখে দাঁড়াতে পারবো কিনা। অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য শ্রমিকদের পাশে দাঁড়িয়ে আমাদেরই রুখে দাঁড়াতে হবে।

[১৩] এখানে সরকারের ব্যর্থতা যেমন একটা বড় ঘটনা, আবার সামগ্রিকভাবে আমরা সাধারণ জনগণ ঐক্যবদ্ধ হয়ে সরকারের নানান অনিয়মের বিরুদ্ধে রুখে দাঁড়াচ্ছি না। যেমন সেজান জুস কারখানার আগুনে মানুষ পুড়ে ছাঁই হলো, কিন্তু জনগণ ফুঁসে উঠলো না। ৯ ও ১০ জুলাই আমরা সিপিবি, টিইউসিসহ বামপন্থী সংগঠনগুলো বিক্ষোভ সমাবেশ করলাম। সাধারণ জনগণ, সচেতন মানুষ এবং সব রাজনৈতিক দল যদি একসঙ্গে অনিয়মের বিরুদ্ধে রুখে দাঁড়াতে পারতাম, তাহলে অন্য চেহারা হতো দেশের। এটা হচ্ছে না বলেই মালিকপক্ষ সুযোগ পেয়ে যাচ্ছে। শ্রমিকদের পুড়ে মরতে হচ্ছে। কৃষক-শ্রমিকেরাই তো এদেশের প্রাণ, দেশকে এগিয়ে নিচ্ছেন কঠোরশ্রমে। অথচ তাদের অবিচারের শিকার হতে হচ্ছে প্রতিনিয়তই। স্বাধীন দেশে এমনটি চলতে পারে না। এটা হয় না। জনগণকে অন্যায়ের বিরুদ্ধে রুখে দাঁড়াতে হবে। তাহলে কেউ সাহস করবে না অন্যায় করতে হবে। অধিকার হরণ করতে।

[১৪] আমাদের দেশে তো এখন আর ভোট হয় না। তারপরও যে সংসদ আছে, তাতে আবার অধিকাংশ ব্যবসায়ী নেতা সংসদে গেছেন। ফলে এ ধরনের ব্যবসায়িক ও পুঁজিপতিবান্ধব সরকার ক্ষমতায় থাকলে তাদের কাছ থেকে শ্রমিকদের স্বার্থরক্ষার আশা করার কিছু নেই। পুঁজিপতিবান্ধব সরকার পরিবর্তন করে শ্রমিকবান্ধব ও মেহনতি মানুষের সরকার প্রতিষ্ঠা করাই একমাত্র সমাধান। মুক্তিযুদ্ধের স্বপ্ন তো এটাই ছিলো। এটা না করা পর্যন্ত এ ধরনের পরিস্থিতির কোনো পরিবর্তন হবে না। চলতেই থাকবে।

 

সর্বশেষ

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