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প্রচ্ছদ

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মোহাম্মদ সাকিব উদ্দিন: শিক্ষার্থীদের গবেষণামূখী করতে বিশ্ববিদ্যালয়ের করণীয় কি?

মোহাম্মদ সাকিব উদ্দিন: চট্টগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়ে প্রতিবছর প্রায় ৪ কোটি টাকারও অধিক বরাদ্দ দেওয়া হয় গবেষণার জন্য। কিন্তু এর ১%- ও কি আদৌ শিক্ষার্থীরা পায়? পায় না। কারণ, শিক্ষার্থীরা গবেষণা করে না বরং তারা বিসিএসমুখী! কিন্তু, শিক্ষার্থীরা গবেষণা করে না কেন??

কারণটা খুবই সহজ। আমরা বিসিএস-কে যেভাবে প্রচার করি গবেষণাকে সেভাবে প্রচার করি না। বিসিএস কিংবা সরকারি চাকরির সুবিধা যেভাবে দিয়ে যাচ্ছি সেভাবে একজন গবেষককে সাপোর্ট করছি না। একজন ক্যাডারকে যেভাবে প্রশংসা এবং সাফল্যের জন্য শুভকামনা জানানো হয়, একজন গবেষককে তার গবেষণায় সাফল্যের জন্য প্রশংসা এবং শুভকামনা কোনোটাই দেওয়া হয় না। তাহলে সমাধান কি? সমাধান সহজ নয় তবে চাইলে সম্ভব।

গবেষণা কতটা প্রয়োজন তা আমরা সবাই জানি। কিন্তু, গবেষণা না করার প্রধান কারণ অর্থাভাব। ভার্সিটির গবেষণা ফান্ডের এক টাকাও স্নাতক পর্যায়ের শিক্ষার্থীদের গবেষণার জন্য ব্যয় করা হয়েছে এমনটা আমি অন্তত দেখিনি। করলেও তা হয়তো খুবই অপর্যাপ্ত। শিক্ষার্থীরা গবেষণা করছে না তাই বরাদ্দ নেই, তাহলে কেন তাদের ফেরানোর ব্যবস্থা প্রশাসন করছে না??

শিক্ষার্থীদের গবেষণায় ফেরানোর জন্য বিশ্ববিদ্যালয় প্রশাসন চাইলে গবেষণা ফান্ডের একটি নির্দিষ্ট পরিমাণ টাকা সেই উদ্দেশ্যে ব্যয় করতে পারে। প্রশাসন চাইলে প্রতিবছর বিভিন্ন প্রতিযোগিতার ব্যবস্থা করতে পারে। যেমনঃ স্নাতক ১ম-৪র্থ বর্ষের কেউ ভালো Impact Factor আছে এমন জার্নালে গবেষণা প্রবন্ধ প্রকাশ করতে পারলে তাকে একটি নির্দিষ্ট পরিমাণ টাকা পুরষ্কৃত করতে পারে।

অথবা, ডিপার্টমেন্ট ভিত্তিক প্রতিযোগিতার ব্যবস্থা করা যেতে পারে। স্নাতক পর্যায়ের কতজন শিক্ষার্থী এবং স্নাতকোত্তর পর্যায়ের কতজন শিক্ষার্থী একটি বিভাগ থেকে গবেষণা প্রবন্ধ প্রকাশ করেছে তার লিস্ট প্রশাসন এর কাছে থাকবে।

একটি কমিটির মাধ্যমে বিভাগ র্যাংকিং করা হবে। প্রতিবছর যখন এই র্যাংকিং এর ভিত্তিতে বিভাগকে পুরষ্কৃত করা হবে তখন একটি নির্দিষ্ট পরিমাণ শিক্ষক ও শিক্ষার্থী এই প্রতিযোগিতায় যুক্ত হবে। বছর শেষে এই প্রজেক্টে ৫০ লাখ টাকাও খরচ হবে না যেখানে আমাদের বরাদ্দ এর প্রায় ৮ গুণ। কিন্তু, সামান্য কিছু টাকার বিনিময়ে যদি আমরা বিশ্বসেরা গবেষক তুলে আনতে পারি, দেশের খ্যাতি অবশ্যই চোখে পড়ার মতো হবে।

র‌্যাংকিং এর খেলায় যখন বিভাগ যুক্ত থাকবে তখন প্রায় প্রত্যেক বিভাগের শিক্ষক-শিক্ষার্থীদের গবেষণায় যুক্ত হওয়ার একটি আকাঙ্ক্ষা কাজ করবে। এর সাথে আরও একটি লাভ হবে। আমাদের অনেক শিক্ষক যারা গবেষণা বিমুখ তাদের উপরেও একটি লুকায়িত চাপ সৃষ্টি করা যাবে যেন তারাও বছর শেষে একটি নির্দিষ্ট পরিমাণ গবেষণা প্রবন্ধ প্রকাশ করতে পারে, যার ফলাফল দেশের জন্য ভালো কিছু বয়ে আনবে। তবে সেটি কোন লুকায়িত জার্নালে নয়। যার IF নূন্যতম ২ এর উপর থাকতে হবে।

বাইরের দেশের বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষকদেরকে কর্তৃপক্ষ কর্তৃক এমন একটি লক্ষ্য ঠিক করে দেওয়া থাকে, যেখানে গবেষণার পরিমাণ-ফলাফল কর্তৃপক্ষের কাছে বছর শেষে পেশ করতে হয়। আমাদের বিশ্ববিদ্যালয়ে ভালো শিক্ষকের কতখানি অভাব তা এই নিয়ম চালু করলেই টের পাওয়া যাবে। ভালো মানের শিক্ষকের উপস্থিতিই পারে ভালো শিক্ষা ও গবেষণার পরিবেশ সৃষ্টি করতে।

এমনটা সম্ভব হলে ভালো শিক্ষক এবং শিক্ষার্থী পেতে আমাদের হয়ত ৫ বছর এর অধিক সময় অপেক্ষা করতে হবে না। কারণ, আমাদের প্রতিভা আছে কিন্তু বিকাশ করার সিস্টেম ঠিক নেই। সিস্টেম ঠিক করতে পারলে প্রতিবছর ভালো মানের গবেষক উঠে আসবে। আজ শুধুমাত্র এই গবেষণার অভাবেই আমরা বিশ্বের দরবারে খাঁটি ভিক্ষুক ছাড়া আর কিছু নই। কিন্তু এর পরিবর্তন হওয়া দরকার।

আমার পরিকল্পনাটি শুধুমাত্র একটি হাইপোথিসিস মাত্র। আমি বিশ্বাস করি একজন শিক্ষার্থী হিসেবে যদি আমি এটুকু চিন্তা করতে পারি তাহলে বিশ্ববিদ্যালয় প্রশাসন চাইলে এর চেয়েও ভালো পরিকল্পনা হাতে নিতে পারবে। শুধুমাত্র সুচিন্তা এবং সদিচ্ছার প্রয়োজন। তবে লক্ষ্য একটাই, গবেষণা বান্ধব পরিবেশ চাই।

অর্থের অভাব দেখিয়ে আর কয়দিন চলবে এভাবে? অর্থ ঠিকই আছে কিন্তু সঠিক জায়গায় ব্যবহার হয় না। উল্লেখ্য, ২০১৯-২০ অর্থবছরে ঢাবি তাদের গবেষণাখাতে বরাদ্দকৃত অর্থ সম্পূর্ণ শেষ করতে পারে নি। তাহলে বরাদ্দকৃত অর্থ যথাযথ ব্যবহার হচ্ছে কিভাবে!! বাকি অর্থ দিয়ে কি ভালো গবেষক তুলে আনার পরিকল্পনা করা যেত না??

জানি না বিশ্ববিদ্যালয় প্রশাসন পর্যন্ত আমার বার্তা পৌঁছাবে কি না। পৌঁছালেও আমার মতো একজন সাধারণ শিক্ষার্থীর কথা আমলে না নেওয়াটাই স্বাভাবিক। তবুও চেষ্টা করতে তো বাঁধা নেই। সবাই চেষ্টা করলে হয়তো সিস্টেম কোনো একসময় পরিবর্তন হতেও পারে। ভুল-ত্রুটি ক্ষমাসুন্দর দৃষ্টিতে দেখবেন।
ধন্যবাদ। ভূগোল ও পরিবেশবিদ্যা বিভাগ, চট্টগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়

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