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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

কল্লোল মোস্তফা: সজীব গ্রুপের সেজান জুস কারখানায় অগ্নিকাণ্ডে অর্ধশতাধিক শ্রমিক মৃত্যুর কার্যকারণ বিষয়ে কিছু প্রাথমিক পর্যবেক্ষণ

কল্লোল মোস্তফা: নানা কারণেই বৈদ্যুতিক সরঞ্জাম, রাসায়নিক ও দাহ্য পদার্থ সম্বলিত কারখানায় আগুন লাগতে পারে। কিন্তু কারখানায় আগুন লাগলেই শ্রমিক মৃত্যু কোন স্বাভাবিক ঘটনা না। আগুন লাগলে ফায়ার এলার্ম বাজবে এবং কারখানায় আগুন ও ধোঁয়া ছড়িয়ে যাওয়ার আগেই নির্দিষ্ট ফায়ার এস্কেপ বা বহির্গমন পথ দিয়ে শ্রমিকরা কারখানা থেকে নিরাপদে বের হয়ে আসবেন এটাই প্রত্যাশিত। এর ব্যতিক্রম হলেই কেবল শ্রমিকের মৃত্যু ঘটতে পারে। ৮ জুলাই নারায়ণ গঞ্জের রুপগঞ্জে সজীব গ্রুপের সুজান জুস কারখানায় অগ্নিকান্ডের ঘটনায় এখন পর্যন্ত ৫২ জনের মৃত্যুর খবর পাওয়া গেছে, সেই সাথে আহত ও নিখোঁজও রয়েছেন অনেকে।

আগুনে পুড়ে শ্রমিক মৃত্যুর ঘটনা অনুসন্ধানে বিভিন্ন তদন্ত কমিটি গঠিত হয়েছে, সেগুলো যদি যথাযথ তদন্ত করে এবং সেই রিপোর্টগুলো যদি প্রকাশিত হয় তাহলে হয়তো জানা যাবে কি কারণে আগুন লাগল এবং আগুন লাগার পর এতজন শ্রমিক বের হতে না পেরে কারখানার ভেতরে পুড়ে কয়লা হলো। কিন্তু আনুষ্ঠানিক তদন্ত রিপোর্ট ছাড়াও ঘটনার পর সংবাদে মাধ্যমে ফায়ার সার্ভিস ও প্রত্যক্ষদর্শী ও ভুক্তভোগী শ্রমিকদের বক্তব্য থেকে আগুনে পুড়ে শ্রমিক মৃত্যুর কার্যকারণ বিষয়ে কিছু প্রাথমিক পর্যবেক্ষণ দাড় করানো যেতে পারে।

এখানে সেরকমই কিছু কারণ উল্ল্যেখ করা হলো:
পর্যাপ্ত সংখ্যক সিঁড়ি না থাকা: ফায়ার সার্ভিসের বক্তব্য অনুসারে, প্রায় ৩৫ হাজার বর্গফুট আয়তনের কারখানা ভবনে অন্তত চার থেকে পাঁচটি সিঁড়ি থাকা দরকার ছিল কিন্তু সিঁড়ি ছিল মাত্র দুটি। আগুন লাগার পরপরই একটি সিঁড়ি ধোঁয়ায় অন্ধকার হয়ে যায় এবং দ্বিতীয় সিঁড়িটিও তাপ ও ধোঁয়ার কারণে ব্যবহার অযোগ্য হয়ে পড়ে, ফলে শ্রমিকরা সময় মতো সিড়ি দিয়ে বের হতে পারেনি। (সূত্র: ১)

বহির্মুখী সিঁড়ি না থাকা: দাহ্য পদার্থ সম্বলিত কোন কারখানার নীচতলায় যখন আগুন লাগে তখন ভেতরমুখী সিড়িগুলো দিয়ে ইটভাটার চিমনির মতো ধোঁয়া উপরের দিকে উঠতে থাকে। ফলে কারখানার ভেতরের দিকের সিড়িগুলো ব্যবহার উপযোগী থাকেনা। একারণেই বিকল্প সিড়ি বা ফায়ার এস্কেপের মুখ থাকতে হয় কারখানার বাইরের দিকে। শ্রমবিধি ২০১৫ এর ধারা ৫৪(৮) অনুসারে, “কমপক্ষে অর্ধেক সংখ্যক সিঁড়ির শেষ প্রান্ত ভবনের বহির্মুখী হইতে হইবে।” ভবনের ভেতরে আগুন লাগলে বহির্মুখী সিড়ি তাপ ও ধোঁয়ার কারণে আচ্ছন্ন হওয়ার ঝুঁকি কম থাকে, ফলে শ্রমিকরা এই সিঁড়ি ব্যবহার করে সহজেই বের হয়ে আসতে পারে। সিজান জুস কারখানার অগ্নিকান্ড নিয়ে সংবাদ মাধ্যমের রিপোর্টগুলোতে বহির্মুখী সিড়ি থাকা না থাকা বিষয়ে স্পষ্ট উল্ল্যেখ না থাকলেও দুটো সিঁড়িই তাপ ও ধোঁয়ায় আচ্ছন্ন হওয়ার বর্ণনা থেকে মনে হচ্ছে দুটি সিঁড়ির মধ্যে একটি সিঁড়িও বহির্মুখী ছিল না। আর এ কারণেই প্রত্যক্ষদর্শীর বর্ণনা থেকে আগুন লাগার পর সিঁড়ি দিয়ে নীচে নামা মানুষদের কোন খোঁজ পাওয়া যায়নি বলে খবর প্রকাশিত হয়েছে। (সূত্র ২)

কমপক্ষে একটি গ্রীলবিহীন জানালা ও দড়ির মই না থাকা: শ্রমবিধি ২০১৫ এর ৫৪ (১০) ধারা অনুযায়ী, প্রতিটি ফ্লোরে ন্যূনতম একটি গ্রীলবিহীন জানালা থাকতে হবে যা ব্যবহার করে জরুরি প্রয়োজনে খুলে লেডার বা দড়ির মই এর সাহায্যে নীচে নেমে আসা যায় এবং নীচ তলায় শক্ত দড়ির জাল সংরক্ষণ করতে হবে যেন অগ্নি দুর্ঘটনার সময় জরুরি প্রয়োজনে দড়ি বেয়ে উক্ত জালে অবতরণ করা যায়। সংবাদ মাধ্যমে গ্রীলবিহীন জানালা ছিল কিনা এ বিষয়ে স্পষ্ট করে উল্ল্যেখ করা না হলেও বিশেষ করে চতুর্থ তলার শ্রমিকদের আটকে পড়ে আগুনে পুড়ে মৃত্যুর ঘটনা থেকে প্রতীয়মান হয় যে অন্তত চতুর্থ তলায় গ্রীল বিহীন কোন জানালা ছিলনা যেটা ব্যবহার করে তারা নীচে নামতে পারতেন। আর সংবাদ মাধ্যমে ও সামাজিক যোগাযোগ মাধ্যমে যেভাবে শ্রমিকদের লাফিয়ে পড়ার খবর/ভিডিও দেখা গেছে তা থেকে বোঝা যায় দড়ির মই বা দরির জাল ইত্যাদি কোন কিছুই ছিল না।

ছাদের সিড়ি তালাবদ্ধ থাকা: শ্রম আইন ২০০৬ এর ধারা ৬২ এর উপধারা ৩(ক) অনুসারে, কোন প্রতিষ্ঠানে কাজ চলাকালীন অবস্থায় কোন কক্ষ বের হওয়ার পথ তালাবদ্ধ বা আটকে রাখা যাবে না এবং বহির্গমনের পথ কোন ভাবে বাধাগ্রস্থ করা যাবে না। সংবাদ মাধ্যমে প্রকাশিত খবর অনুযায়ী, কারখানার চতুর্থ তলা থেকে ছাদে যাওয়ার সিঁড়ি তালাবদ্ধ ছিল। নিচের দিকে সিঁড়ির ল্যান্ডিংয়ে ছিল আগুন থাকায় শ্রমিকরা নিচে নামতে পারেননি, আবার ছাদে যাওয়ার সিঁড়ি তালাবদ্ধ থাকায় ছাদেও উঠতে পারেননি। (সূত্র ৩) সম্ভবত এ কারণেই পুড়ে যাওয়া কারখানা ভবন থেকে যে ৪৯ জনের লাশ উদ্ধার করা হয়েছে, তার বেশির ভাগই পাওয়া গেছে চতুর্থ তলায়, যে লাশগুলো পড়েছিল চতুর্থ তলার দক্ষিণ-পূর্ব কোণে জানালার ধারে। (সূত্র: ৪) শুধু চতুর্থ তলার সিড়িই নয়, ফায়ার সার্ভিসের বক্তব্য থেকে ভবনের বিভিন্ন ফ্লোর নেট দিয়ে আটকানো থাকার কথা জানা গেছে যেকারণে অনেক শ্রমিক বাঁচার জন্য নেটের বাইরে যেতে পারেননি। (সূত্র: ৫)
অগ্নিনিরাপত্তা সরঞ্জাম না থাকা: কারখানা ভবনে উদ্ধার তৎপরতায় অংশ নেওয়া ফায়ার সার্ভিসের কর্মকর্তারা বলেছেন, ভবনে অগ্নিনির্বাপণব্যবস্থা বা অগ্নিনিরাপত্তা সরঞ্জাম তাদের চোখে পড়েনি। আবার ভুক্তভোগী শ্রমিকদের বক্তব্য থেকে দেখা যাচ্ছে তারা ফায়ার এলার্ম নয়, আগুন থেকে তৈরী হওয়া ধোঁয়া ছড়িয়ে পড়ার পর আগুনের অস্তিত্ব সম্পর্ক জানতে পারেন। যেমন: প্রত্যক্ষদর্শী ও কারখানার আহত শ্রমিক সবুজ আলম প্রথম আলোকে বলেন, তিনি কাজ করছিলেন দ্বিতীয় তলায়। হঠাৎ ভবনের ভেতর ধোঁয়ার কুণ্ডলী দেখতে পান। (সূত্র: ৬) শ্রমিকরা যদি আগুন লাগার সাথে সাথে ফায়ার এলার্ম শুনতে পেতেন তাহলে হয়তো আগুন ও ধোঁয়া ছড়িয়ে যাওয়ার আগেই কারখানা থেকে নিরাপদে বের হয়ে যাওয়ার সুযোগ পেতেন। আর অগ্নি নিরাপত্তা সরঞ্জাম এবং নিজস্ব ফায়ার ফাইটিং টিম থাকলে হয়তো আগুন বেশি ছড়িয়ে পড়ার আগেই নিয়ন্ত্রণ করা সম্ভব হতো।

কারখানার ফ্লোরকে দাহ্য পদার্থের গুদাম হিসেবে ব্যবহার: কারখানার ব্যবস্থাপক কাজী রফিকুল ইসলাম সাংবাদিকদের বলেছেন, কারখানা ভবনটি কেন্দ্রীয় গোডাউন হিসেবে ব্যবহার করা হতো। ভবনে বিভিন্ন জুসের ফ্লেভার, রোল, ফয়েল প্যাকেটসহ বিভিন্ন মাল ছিল। হাজার হাজার শ্রমিক কাজ করে এমন একটি কারখানার ফ্লোরকে কোন ধরণের অনুমোদন না নিয়ে দাহ্য পদার্থের গুদাম হিসেবে ব্যবহার করার কারণেই অগ্নিঝুকি তৈরী হয়েছে, আগুন লাগার পর তা দ্রুত ছড়িয়েছে, ব্যাপক ধোঁয়া তৈরী করে ১৬ ঘন্টার বেশি সময় ধরে জ্বলেছে যার ফলে শ্রমিকদের জীবন বিপন্ন হয়েছে। এ বিষয়ে এফবিসিসিআইর কেমিক্যাল ও শিল্পবিষয়ক স্ট্যান্ডিং কমিটির চেয়ারম্যান মো. বেলায়েত হোসেন বলেছেন, এই অগ্নিদুর্ঘটনা ভয়াবহ হয়েছে পেট্রোসিনথেটিক কেমিক্যাল পদার্থ ও রেজিনের কারণে। এ কারখানার মধ্যে অতিরিক্ত পেট বোতল ও পলি প্যাকেটসহ নানা প্লাস্টিক পণ্য ছিল। এমনকি শ্রমিকদের গায়ের পোশাক ছিল পলিয়েস্টারের। এসব কারণে আগুনে ক্ষতি অনেক বেশি হয়েছে। কারখানা ভবনে যে পরিমাণ মাল রাখার বিধান আছে, তার চেয়ে পাঁচগুণ মাল মজুদ করা ছিল। কাঁচামাল থেকে শুরু করে তৈরি পণ্য- সবই ওখানে মজুদ ছিল। কারখানা ভবনের মধ্যে গুদাম ব্যবহার করা সম্পূর্ণ বেআইনি। এ কারখানা গুদাম ব্যবহার করায় বদ্ধ ছিল। এতে ভেতরে অনেক দ্রুত আগুন ছড়িয়ে পড়েছে এবং দীর্ঘ সময় ধরে জ্বলেছে।(সূত্র: ৭)

কারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তরের দ্বায়িত্ব পালন না করা: কারখানা মালিকের দ্বায়িত্ব হলো শ্রমিকদের জন্য নিরাপদ কর্ম পরিবেশ নিশ্চিত করা আর সরকারের দ্বায়িত্ব হলো মালিকপক্ষ তা যথাযথভাবে বাস্তবায়ন করছে কিনা তা তদারকি করা। এজন্য সরকারের কতগুলো নির্দিষ্ট বিভাগ আছে, কল কারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তর এর মধ্যে একটি যার কাজ নিয়মিত তদারকি করা। প্রশ্ন হলো কলকারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তর কি সজীব গ্রুপের এই কারখানাটির তদারকির কাজটি যথাযথ ভাবে করেছিলো? সরকারের কলকারখানা অধিদপ্তর যদি এই তদারকির কাজটি সঠিক ভাবে করতো তাহলে কারখানায় পর্যাপ্ত সংখ্যক বহিমুর্খী সিড়ি না থাকা, অগ্নিনিরাপত্তা সরঞ্জাম না থাকা, কারখানার সিড়ি পথ তালাবদ্ধ থাকা, বিভিন্ন ফ্লোর নেট দিয়ে আটকানো থাকা, গ্রীল বিহীন জানালা ও দড়ির মই না থাকা, কারখানাকে দাহ্য পদার্থের গুদাম হিসেবে ঝুঁকিপূর্ণ ভাবে ব্যবহার করা ইত্যাদি বিষয় তাদের পরিদর্শনেই উঠে আসার কথা।

কারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তরের নারায়ণগঞ্জ কার্যালয়ের উপমহাপরিদর্শক সৌমেন বড়ুয়া এ ব্যাপারে প্রথম আলোকে বলেন, ‘হাসেম ফুড ২০০০ সালে আমাদের প্রধান কার্যালয় থেকে লাইসেন্স নেয়। পরবর্তী সময়ে তারা প্রতিবছর লাইসেন্স নবায়ন করেছে। তবে ওই ভবনের কোন তলায় এবং কোথায় কী ধরনের বস্তু আছে, তা দেখার জন্য আমরা সেখানে পরিদর্শনের জন্য আবেদন করেও অনুমোদন পাইনি। তাই আমাদের জানা নেই সেখানে কোথায় কোন ধরনের দাহ্য পদার্থ আছে।’ (সূত্র ৮) এই বক্তব্য থেকে কারখানা পরিদর্শন দপ্তরের দ্বায়িত্বহীনতার কথাই প্রকাশ পায়। কারণ কারখানার অগ্নি নিরাপত্তা ব্যবস্থা ঠিকঠাক আছে কিনা তা না দেখেই লাইসেন্স প্রদান এবং বছর বছর লাইসেন্স প্রদান করা দ্বায়িত্বের গুরুতর অবহেলা। শ্রম আইন ২০০৬ এর ধারা ৬২ এর উপধারা ২ অনুসারে, যদি কোন পরিদর্শকের কাছে মনে হয় যে, কোন প্রতিষ্ঠানের কোন ভবন বা তার কোন অংশ বা কোন পথ, যন্ত্রপাতি বা প্ল্যান্ট বা অভ্যন্তরীণ বৈদ্যুতিক ব্যবস্থা ইত্যাদির ব্যবহার মানুষের জীবন বা নিরাপত্তার জন্য আশু বিপজ্জনক, তাহলে তিনি কারখানা মালিকের উপর লিখিত আদেশ জারী করে, সেই সমস্যার যথাযথ সমাধান না করা পর্যন্ত তার ব্যবহার নিষিদ্ধ করতে পারবেন৷ এই ধারা থেকে দেখা যাচ্ছে, কারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তর চাইলে কোন কারখানার অগ্নি নিরাপত্ত ব্যবস্থা ঠিকঠাক না থাকলে তা বন্ধ করে দেয়ার ক্ষমতা রাখে। প্রশ্ন হলো, সজীব গ্রুপের সেজান কারখানাটির ব্যাপারে কি কারখানা পরিদর্শন অধিদপ্তর সেরকম কোন পদক্ষেপ গ্রহণ করেছিলো নাকি কোন ধরণের পরিদর্শন ও যাচাই বাছাই ব্যতিরেকেই বছর বছর দ্বায়িত্বহীন ভাবে লাইসেন্স নবায়ন করে যাচ্ছিল?

আগুনে পুড়ে শ্রমিক মৃত্যুর ঘটনা অনুসন্ধানে যেসব তদন্ত কমিটি গঠিত হয়েছে, সেই কমিটিগুলোকে এই প্রসঙ্গগুলোর সুনির্দিষ্ট ব্যাখ্যা ও জবাব দিতে হবে এবং সরকারকে সেই অনুযায়ী দায়ী ব্যক্তিদের চিহ্নিত করে দৃষ্টান্তমূলক শাস্তির ব্যবস্থা করতে হবে।
তথ্যসূত্র:

১) তালাবদ্ধ কারখানায় পুড়ে অঙ্গার, সমকাল, ১০ জুলাই ২১; আবার অগ্নিকাণ্ড, নিহত ৫২, প্রথম আলো, ১০ জুলাই ২১; অবহেলায় আরও একটি নরককুণ্ড, অর্ধশত লাশ, বিডিনিউজ টোয়েন্টিফোর ডটকম, ১০ জুলাই ২১

২) ‘জীবনডা হাতে নিয়া রশি বাইয়া ছাদ থিকা নিচে নামছি’, বাংলাট্রিবিউন, ৯ জুলাইন ২০২১

৩) তালাবদ্ধ কারখানায় পুড়ে অঙ্গার, সমকাল, ১০ জুলাই ২১; অবহেলায় আরও একটি নরককুণ্ড, অর্ধশত লাশ, বিডিনিউজ টোয়েন্টিফোর ডটকম, ১০ জুলাই ২১

৪) আবার অগ্নিকাণ্ড, নিহত ৫২, প্রথম আলো, ১০ জুলাই ২১
৫) তালাবদ্ধ কারখানায় পুড়ে অঙ্গার, সমকাল, ১০ জুলাই ২১
৬) আবার অগ্নিকাণ্ড, নিহত ৫২, প্রথম আলো, ১০ জুলাই ২১
৭) অনুমতি ছাড়াই ভবনে ছিল কেমিক্যাল গুদাম, সমকাল, ১০ জুলাই ২১
৮) দীর্ঘস্থায়ী আগুন, প্রাণহানি, প্রথম আলো, ১০ জুলাই ২০২১

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