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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

তুষার আবদুল্লাহ: মন্ত্রী নাকি আমলা?

তুষার আবদুল্লাহ: অবশেষে তাদের নিদ্রা ভঙ্গ হলো। আড়মোড়া ভেঙে দেখলেন, উঠানে ফোটা গন্ধরাজ নেই। পাশের বাড়ির কেউ তুলে নিয়ে গেছে। তাদের ফুলদানিতে শোভা পাচ্ছে গন্ধরাজটি। নিজ হাতে বোনা গন্ধরাজের সৌরভ বঞ্চিত হয়ে এখন তারা হা-পিত্যেস করতে শুরু করেছেন। কিন্তু যখন গাছের চারাটির যত্ন নেওয়ার প্রয়োজন ছিল, তারা নেননি। গন্ধরাজের সৌরভ উপভোগে মত্ত ছিলেন, ঢলে পড়েছিলেন দীর্ঘ নিদ্রায়। এই অবসরে গাছের যত্ন নেওয়ার কৌশলে পাশের বাড়ি পুরো গাছটিই নিজের উঠানে নিয়ে গেছে। এখন দুঃখে বুক চাপড়ানো ছাড়া আর কোনো উপায় নেই। বাংলাদেশের রাজনীতিবিদদের সেই গাছ হারানো উঠান মালিকের মতোই মনে হচ্ছে। কখন তাদের হাত থেকে ক্ষমতা, রাজনীতি সরে গেছে, তারা বুঝতে পারেননি। এক সময় যারা ছিলেন রাজনীতির কাণ্ড, তারাই এখন পরজীবী ফুল। পদ আছে, পদের ভোগবিলাস আছে, কিন্তু পদের ক্ষমতা বা নেতৃত্ব দেওয়ার ‘ক্যালসিয়াম’ নেই। তারা এখন আমলাতন্ত্রের মুখাপেক্ষী হয়ে ‘ইজ্জত’রক্ষার লড়াই করে যাচ্ছেন। তাদের এই অসাহয়ত্ব দেখে জনগণের মায়া হচ্ছে ঠিকই, তবে সেই মায়া ভালোবাসার নয় করুণার।

খুব দূর অতীতে যাওয়ার প্রয়োজন নেই। আমরা যদি ১৯৯১ ও ১৯৯৬ এর জাতীয় সংসদের দিকে তাকাই, দেখবো সরকারি ও বেসরকারি দলের হয়ে তর্কে-বিতর্কে কারা সংসদকে প্রাণবন্ত করে রেখেছেন। ওই সংসদ সদস্যরা সংসদের ভেতরে যেমন তাদের মেধা ও প্রজ্ঞা দেখিয়েছেন, রাজনীতির মাঠেও একেবারে তৃণমূল পর্যন্ত তারা ছিলেন জন মানুষের নেতা। ব্যতিক্রম ছিলো। ওই সময় থেকেই সামরিক, বেসামরিক আমলা, ব্যবসায়ীরা সংসদে প্রবেশের টিকিট পেতে থাকেন। ২০০১ পর্যন্ত দেখা গেল ত্যাগী, চৌকস নেতাদের বাদ রেখে টাকার বিনিময়ে সংসদের আসন বিক্রি হতে শুরু হলো। যে দলটি ২০০১ এ ক্ষমতায় এলো, সেখানে প্রবীণ, অভিজ্ঞ রাজনীতিবিদরা উপেক্ষিত ও অবহেলিত হতে থাকলেন। তরুণ নেতৃত্বের অজুহাতে রাজনীতির বাইরের মানুষদের এনে রাজনীতিতে জায়গা দেওয়া শুরু হলো। রাজনীতি, ক্ষমতা দল যেন করপোরেট শিল্প গোষ্ঠী। ওই প্রক্রিয়া পরবর্তীতে আরও পুষ্টি লাভ করে এবং এখনও পুষ্টই হচ্ছে। ওইদিকে সংসদে রাজনীতির চর্চা, আইন প্রণয়ন এক তরফা হতে থাকে, অন্য পক্ষের সংসদ বর্জনের মধ্য দিয়ে। বড় দুই রাজনৈতিক দল এই দায় নিশ্চয়ই অস্বীকার করবে না। রাজনীতিতে, সংসদে যখন মাঠের ও জনগণের ভোট নিয়ে আসা রাজনীতিবিদদের পদচারণা ছিল সংখ্যাগরিষ্ঠ, তখন কেন্দ্র থেকে তৃণমূল সর্বত্র প্রশাসন, আমলাতন্ত্রে রাজনীতিবিদদের নেতৃত্ব, অভিভাবকত্ব এবং কর্তৃত্ব ছিল। সেই সময়ের আমলাতন্ত্রও রাজনীতিবিদদের নেতৃত্বকে সমীহ করতেন। সেই সময়ের আমলাতন্ত্রের কুশীলবরাও ছিলেন বলিষ্ঠ। তবে রাজনীতিবিদরা তাদের ওপর নির্ভরশীল ছিলেন না।

আমলারাও জানতেন তাদের ফাঁকি দেওয়া সম্ভব না। আমলাতান্ত্রিক দীর্ঘসূত্রিতাও রাজনৈতিক নির্দেশনাকে আটকে রাখতে পারেনি। দুই একটি ব্যতিক্রম উদাহরণ থাকতেই পারে। যেহেতু সেই সময়ের আমলাদের বিচক্ষণতার ‘খনিজ’ মাত্রা বেশি ছিলো, তারা অনেক সময় অপ্রয়োজনীয় সিদ্ধান্ত থেকেও রাজনৈতিক নেতৃত্বকে রক্ষা করতেন। বলছি না, সেই সময়ের রাজনীতিবিদ ও আমলারা দুর্নীতিমুক্ত ছিলেন। কিন্তু যেহেতু রাজনীতিবিদদের জনগণের কাছে জবাবদিহিতা ছিলো, তাই, তারা বেপরোয়া খুব একটা হয়ে উঠতে পারতেন না। আমলারাও তাই। বাইরের মানুষদের রাজনীতিতে অনুপ্রবেশ ঘটায়, তারা আর জনগণমুখী রইলেন না। তারা রাজনীতিকে বিনিয়োগের একটি ইউনিট হিসেবে দেখলেন। বিনিময়ে তারা হাতিয়ে নিতে থাকেন লাভ। এক্ষেত্রে অদক্ষ ও নব্য রাজনীতিবিদদের আমলা নির্ভর হওয়া ছাড়া আর কোনো উপায় রইলো না। রাজনীতিবিদরাও দক্ষ আমলার বদলে, খুঁজতে থাকলেন রাজনৈতিক আনুগত্য। তাদেরই সিঁড়ি দিয়ে তড় তড় করে উপরে তুলে দিলেন। এতোটাই ওপরে যে জেলা, উপজেলা দেখতেন সংসদ সদস্যরা। সেখানে বসে গেলেন আমলা। জেলা প্রশাসক সরাসরি প্রধানমন্ত্রীর সঙ্গে কথা বলেন। মন্ত্রী, সংসদ সদস্যকে মলিন মুখে সেটা দেখতে হয়, সইতে হয়। অদক্ষ, আমলাতন্ত্র, রাষ্ট্রের গোপন তথ্য যেমন গোপন রাখতে পারেনি, প্রকাশ বা সরবরাহ করেছে নানা দিকে, তেমনি দুর্নীতির ক্ষেত্রেও তারা বাঁধ ভেঙ্গে ফেলেছে। যার দায় অনেকটা রাজনীতিবিদদের নিতে হয়েছে। একসময় মন্ত্রী বা সংসদ সদস্য নিজ এলাকায় বা কোনো জেলা সফরে গেলে প্রশাসনের মধ্যে যে কম্পন বা চঞ্চলতা দেখা যেত, সেখানে এখন দীর্ঘ ভাটা পড়ে গেছে। এলাকায় প্রশাসনের মন জুগিয়েই চলতে হয় বেচারা রাজনীতিবিদদের। সইয়ে যাওয়ার একটা সীমারেখা আছে, সেই রেখার শেষ প্রান্তে পৌঁছেই জাতীয় সংসদে, প্রবীণ সংসদ ও রাজনীতিবিদরা হয়তো নিজেদের মনের জ্বালা প্রকাশ করেছেন। কিন্তু সাধারণ ভোটার বা জনগণ তাদের এই অসহায়ত্বের দীর্ঘদিনের সাক্ষী। তারা চান রাজনীতিবিদরা ফিরে আসুন তাদের স্বমহিমায়। পুরনো মুকুটে। সূত্র : ঢাকা পোস্ট
লেখক : গণমাধ্যমকর্মী

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