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প্রচ্ছদ

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কাজী হানিয়াম মারিয়া: আমার ‘অবাধ্য’ আব্বা!

কাজী হানিয়াম মারিয়া: আমার আব্বা তার এগারো ভাইবোনের সবার ছোটজন। সবার আদরে একটু একরোখা স্বভাবের, যেটা উত্তরাধিকার সূত্রে আমি পেয়ে গেছি। তার প্রচ্ছন্ন প্রশ্রয়ে সেটা প্রতিদিনই একটু করে বাড়ছে! আমি বাচ্চাকালে লুকিয়ে ইটের টুকরা খেতাম। আম্মা বকা দিলে আব্বা কোলে করে বাইরে নিয়ে যেতেন। তখন আবার আমি ইট খেতে চাইলে, বেছে বেছে ছোট ইটের সুরকি খুঁজে ধুয়ে খেতে দিতেন, যেন আমার কান্না থামে। ট্রেনের ড্রাইভার কোথায় বসে দেখতে চাওয়ায় আব্বা কোলে করে ট্রেনের একদম সামনের কামরায় নিয়ে গিয়েছিলেন। তারপর ১/২টা স্টেশন সেখানে বসে ট্রেন চালানো দেখেছি। বাসার পাশের নদীর ওপর দিয়ে যাওয়া বড় বড় ফাঁকের রেললাইন দৌঁড়ে পার হতে শেখানো, ঘাটের চারপাশে বাঁশ দিয়ে ঘেড় দিয়ে সাঁতার শেখানো থেকে শুরু করে সাইকেল চালানো। আমার কেন জানি, সেই যুবক আব্বাকে ইচ্ছে করে দেখতে। তিনি এখনো এসব অদ্ভুত ইচ্ছেকে গুরুত্ব দিয়ে শুনেন এবং পূরণ করার চেষ্টা করেন।

প্যারেন্টস ডেতে আমি সালমান খানের পোস্টার নিয়ে আসতে বলেছিলাম। দোকানি আব্বাকে অক্ষয় কুমারের অভিনয় জীবনের শুরুর দিকের জংলি টাইপ ছবি দিয়েছে! আমি রাগ করে পোস্টার লুকিয়ে ফেলেছি। গাল ফুলানো দেখে আব্বা বুঝতে পারলেন, ভুল হয়ে গেছে। তিনি পারলে তখনই বোম্বে থেকে জ্যান্ত সালমান খানকে ধরে এনে আমাকে দিয়ে দেন। দেয়নি বলেই বেচারা এখনো অবিবাহিত। তবে এটা শুধু নায়ক বলেই মনে হয় এতো উদারতা দেখিয়েছেন। কারণ বিয়ের আগ পর্যন্ত যতো ছেলে বাসায় আমার সঙ্গে দেখা করতে আসছে, তারা বাড়ি থেকে বেরোনোর সময় আব্বার কঠিন জেরার মুখে পড়েছে। আমার বন্ধুরা কেউ আসতে চাইতো না আব্বার চোখের মাইরের ভয়ে। একবার ট্রেনে একটা ছেলে বারবার এটা সেটা জিজ্ঞেস করছে। স্টেশন আসার আগেই তাকে বললাম আমার সঙ্গে আর কথা বলবেন না। আমার আব্বা আসবেন নিতে। তিনি অবাক হয়ে জিজ্ঞেস করলেন কেন? বললাম, আমাকে কিছু বলবেন না কিন্তু আপনাকে মেরে ফেলবে।

আসলেও আব্বা ট্রেনে উঠে তার দিকে তাকিয়ে তাকিয়ে আমার ব্যাগ নিয়েছেন, কোনো সমস্যা হয়েছে কিনা জিজ্ঞেস করেছেন। অন্য বাবাদের মতোই আমার আব্বা পজেসিভ। সেটা এখনও এত বড় হয়ে গেছি, তারপরও দেশের ভিতর একা কোথাও যাওয়া নিয়ে ঝামেলা করে। কয়েকবছর আগে হঠাৎ সন্ধ্যায় ছোটভাই কল করলো, আপু আব্বাকে হসপিটালে নিয়ে যাচ্ছি, বুকে ব্যথা করছে নাকি। আমি তখন মাত্র ইউনিভার্সিটি থেকে ফিরেছি, সাথে সাথে হসপিটালের উদ্দেশে বের হলাম। যেতে যেতে ওখানে পরিচিত কে আছে খোঁজ নিয়ে কথা বললাম। আমি অনেক আগেই পৌঁছে অপেক্ষা করছি। আমার ছোটবোন দেশের বাইরে থেকে কল করছে, আপু আব্বা কি মারা যাচ্ছেন? তখন পর্যন্ত আমার কাছে আব্বার অসুস্থতার ব্যপারটা রুটিন চেক-আপ মনে হচ্ছিলো। একটুপর একটা আ্যম্বুলেন্স থামলো আমার সামনে। আমার ভাই সামনে থেকে নেমে আসলো। ঠিক তখন আমি ভয় পেয়ে গেলাম। আব্বা আ্যম্বুলেন্সে কেন আসবেন? স্ট্রেচারে করে অচেতন তাকে যখন ইমারজেন্সিতে নিয়ে যাচ্ছে, আমার হাত-পা অবশ হয়ে গেছে, নিঃশ্বাস নিতে কষ্ট হচ্ছিলো! প্রাথমিক চিকিৎসার পর ডাক্তার আমাকে বলছেন যে, পথেই বড় হার্ট অ্যাটাক হয়ে গেছে। এখন তারা অবজারভেশনে রাখবেন, কিন্তু আইসিইউ ফাঁকা নেই। আমার মনের অবস্থা তখন এমন যে আমার আব্বা আইসিইউ না পেলে পুরো হসপিটাল আমি গুড়িয়ে দেবো। কিন্তু নড়াচড়া করতে পারছি না। যদিও আমি তার দিকে এতোই করুণ চোখে তাকালাম (তার ভাষ্যমতে) যে তিনি নিজেই উঠে চলে গেলেন আইসিইউ’র ব্যবস্থা করতে। আমার সেই আব্বা আইসিইউতে একটু ভালো বোধ করতেই আশেপাশের সেবা শুরু করে দিলেন।

অক্সিজেন মাস্ক মুখে রেখে আমাকে বলছেন, পাশের বেডের রোগীটার কষ্ট হচ্ছে মনে হয়, ডাক্তারকে ডেকে বলো। আলহামদুলিল্লাহ, তিনি সেই কঠিন সময় পার করে ফেলেছেন। কিন্তু আমরা বুঝে গেছি, তিনি ছাড়া পৃথিবী কেমন হতে পারে। যে পৃথিবী আমি কখনো দেখতেই চাই না। আমার আব্বার অক্টোপাসের মতো তিনটা হৃদয় যেখানে আমরা তিন ভাইবোন ফেলে চড়ে থাকি। হয়তো বড় দেখে আমি একটু আদর বেশি পেয়ে থাকি। আমি যখনই বলেছি, আব্বা আমি বাইরে সেটেলড করি। তখনই বলছেন, আমি কীভাবে থাকবো তাহলে? আমার ছোট বোনের বাইরে বিয়ের সময় বারবার আমাকে কল করে বাইরে থাকা নিয়ে বিরক্ত প্রকাশ করেছে। বাবাদের আসলে মানুষ হিসেবে বিচার করা খুব কঠিন। তার কোনো একগুয়েমি বা ভুল কাজের কথা শুনলে আমি বিরক্ত হই। আমাদের তুমুল ঝগড়া হয়ে কথা বন্ধ হয়ে যায়। পরদিনই তিনি আশপাশ দিয়ে মন খারাপ করে ঘোরাঘুরি করেন। যেটা খেতে পছন্দ করি, সেটার ব্যবস্থা করতে বলেন, কিন্তু তবু আগে কথা বলেন না। জিদ্দি মানুষ। আমিই পরে আবার ঝগড়া করে কথা শুরু করি। এই বয়ষ্ক লোকটির মনের এক কোণে এখনও তার মা লুকিয়ে আছেন। নিজের বাবাকে খুব ছোটবেলায় হারিয়েছেন, তাই হয়তো মনে নেই। ভালো মানুষের উদাহরণ দিতে হলে কথায় কথায় নিজের মাকে স্মরণ করেন। জানো, ‘তোমার দাদী কখনো উচ্চস্বরে কথা বলতেন না, লাগালাগি করতো না, মানুষের সঙ্গে ভালো ব্যবহার করতেন, আর তুমি কতো কঠিন ব্যবহার করো।’ আমার পিতৃস্নেহের অভাবে বড় হওয়া বাবা কিন্তু নিজে বাবা হিসেবে অনেক ভালো। তার কাছে আমি এখনো ছোট আছি, যার ঘরের কাজ করার বয়স হয়নি।

আমার বিয়েতে বিদায়ের সময় তাকে খুঁজে পাওয়া যাচ্ছে না। আমি চোখমুখ লাল করে চারপাশে তাকাচ্ছি। সেই কিছু সময় মনে হয় নিজেকে সামলাতে নিলেন, তারপর এমনভাবে হাত ধরলেন যে আমার সংসারকেও নিজের সংসার করে নিলেন। হজে যাবার সময় সবাই আমাকে কতো কতো দোয়ার কথা বললেন, আমার কতো অপূর্ণতার কথা মনে করিয়ে দিলেন। কিন্তু বায়তুল্লাহর সামনে দাঁড়িয়ে কম্পিত ও ক্রন্দনরত আমার প্রথম দোয়াই ছিলো, আমি পৃথিবীতে আব্বা-আম্মা ছাড়া একদিনও থাকতে চাই না। দোয়া কবুলের মালিক আল্লাহপাক! রাব্বির হামহুমা কামা রাব্বায়ানী সগীরা।

লেখার প্রথমে বলেছিলাম যে, যুবক আব্বাকে দেখতে ইচ্ছে করে। মাহিরার জন্য যখন রাত তিনটায় চকলেট আনতে বাইরে চলে যান তখন বুঝি তিনি আমাদের জন্য কী কী করতেন। তিনি একদমই নিজের যত্ন নেন না। নিজের বয়সের দিকে খেয়াল না করে কাজ করতে থাকেন। এই অবাধ্য আব্বা সবসময় সুস্থ থাকুক। ফেসবুক থেকে

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