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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

কোভিডের পর হৃদরোগ শ্বাসতন্ত্র স্নায়ু সমস্যায় ভুগছে রোগীরা

নিউজ ডেস্ক: কোভিড-১৯ রোগে আক্রান্ত ব্যক্তিদের একটি বড় অংশ সুস্থ হওয়ার পরও নানা শারীরিক সমস্যায় ভুগছে। শরীরে নভেল করোনাভাইরাসের জীবাণু না থাকলেও অন্যান্য জটিলতা থেকে যাচ্ছে। বিশেষ করে হৃদরোগ, শ্বাসতন্ত্র ও স্নায়ুতন্ত্রের বিভিন্ন সমস্যা দেখা দিচ্ছে। চিকিৎসকরা বলছেন, করোনা সারলেও শতভাগ সুস্থ হওয়া যায় না। কভিড-১৯ থেকে সেরে ওঠা ব্যক্তিদের শারীরিক নানা জটিলতার দীর্ঘমেয়াদি চিকিৎসার জন্য রাজধানীতে দুটি পোস্ট-কভিড ক্লিনিক চালু করেছে ঢাকা মেডিকেল কলেজ (ঢামেক) হাসপাতাল ও বঙ্গবন্ধু শেখ মুজিব মেডিকেল বিশ্ববিদ্যালয় (বিএসএমএমইউ)। এসব ক্লিনিকে সেবা নিচ্ছে কভিড নেগেটিভ হওয়ার পরও নানা শারীরিক সমস্যায় আক্রান্ত রোগীরা।

এমনই একজন ষাটোর্ধ্ব আলিমুল ইসলাম। কভিড-১৯ রোগে আক্রান্ত হয়ে গত ডিসেম্বরে রাজধানীর বিএসএমএমইউতে ভর্তি হয়েছিলেন। সে সময় ১৫ দিনেরও বেশি সময় ধরে চিকিৎসার পর সেরে ওঠেন তিনি। তবে এর দিন দশেক পর আবার কাশি ও শ্বাসকষ্ট দেখা দেয়। এরপর তিনি ওই প্রতিষ্ঠানের পোস্ট-কভিড ক্লিনিকে চিকিৎসকের পরামর্শের জন্য আসেন। জানুয়ারি ও ফেব্রুয়ারিতে দুই দফা চিকিৎসা শেষে এখন প্রায় সুস্থ তিনি।

শুধু আলিমুল ইসলামই নন। করোনা থেকে সেরে ওঠার পর এ ধরনের সমস্যার মধ্য দিয়ে যাচ্ছেন অনেকেই। রাজধানীর দুটি পোস্ট-কভিড ক্লিনিকে আসা ব্যক্তিদের অর্ধেকই শ্বাসকষ্ট, অনিয়ন্ত্রিত ডায়াবেটিস ও ফুসফুসের জটিলতায় ভুগছে। চিকিৎসকের পরামর্শে ব্যবস্থা নেয়ার ফলে বেশির ভাগ সুস্থ হচ্ছে। তবে কারো কারো ক্ষেত্রে মারাত্মক জটিলতাও দেখা দিচ্ছে।

ভাইরাস ও রোগতত্ত্ব্ববিদরা বলছেন, কভিড-১৯ রোগে আক্রান্ত হয়ে হাসপাতালে চিকিৎসায় সেরে উঠে ছাড়পত্র নিয়ে বাড়িতে যাওয়ার কিছুদিন পর অনেকের শরীরে জটিলতা দেখা দিচ্ছে। করোনা নেগেটিভ হলেও শতভাগ সুস্থ হওয়া যায় না। হৃদরোগ, শ্বাসতন্ত্র ও স্নায়ুতন্ত্রের বিভিন্ন সমস্যা দেখা দিতে পারে। অনিয়ন্ত্রিত ডায়াবেটিস, উচ্চরক্তচাপ, হৃদরোগ, কিডনির সমস্যা, অ্যাজমা, ক্যান্সারসহ বার্ধক্যজনিত নানা জটিলতা যাদের রয়েছে, তাদের বেশি সতর্ক থাকতে হবে। বর্তমানে দীর্ঘায়িত হচ্ছে করোনা-পরবর্তী জটিলতা। অসুস্থ থাকাকালে প্রয়োগকৃত ওষুধের পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া থেকেই মূলত এসব সমস্যা দেখা দেয়।

কভিড-১৯ থেকে সেরে ওঠা ব্যক্তিদের শারীরিক নানা জটিলতার দীর্ঘমেয়াদি চিকিৎসার জন্য গত ২৫ আগস্ট ঢামেক হাসপাতাল ও ২৯ আগস্ট বিএসএমএমইউতে পোস্ট-কভিড ক্লিনিক চালু হয়। সপ্তাহের রবি ও বুধবার ঢামেক হাসপাতাল এবং শনি ও মঙ্গলবার বিএসএমএমইউতে সকাল থেকে দুপুর পর্যন্ত ইন্টারনাল মেডিসিনের বহির্বিভাগে এ সেবা দেয়া হয়। বহির্বিভাগ থেকে নির্দিষ্ট মূল্যে টিকিট কিনে চিকিৎসকের পরামর্শ নিতে পারেন পোস্ট-কভিড রোগীরা। সেখানে গিয়ে দেখা যায়, ক্লিনিকে আসা ব্যক্তিরা সুস্থ হওয়ার পরও নানা জটিলতায় ভুগছে। সেসব সমস্যা নিয়েই চিকিৎসকের কাছে আসছে তারা। পরীক্ষা-নিরীক্ষা করে প্রয়োজনে বিশেষায়িত চিকিৎসার জন্য পালমোনোলজি, কার্ডিওলজি, নেফ্রোলজি, নিউরোলজি, সাইকিয়াট্রি, ফিজিক্যাল মেডিসিনসহ অন্যান্য বিভাগে এসব রোগীকে পরবর্তী চিকিৎসার জন্য পাঠানো হয়। এ ক্লিনিক দুটির তথ্য বলছে, সেবা শুরু করার পর এখন পর্যন্ত ঢামেক হাসপাতালে ৮৫০ ও বিএসএমএমইউয়ে দুই হাজারের বেশি ব্যক্তি চিকিৎসা নিয়েছে।

পোস্ট-কভিড ক্লিনিকের চিকিৎসকরা বলছেন, যারা চিকিৎসকের পরামর্শের জন্য আসছে তাদের মধ্যে জটিলতা বেশি। তবে সেবাপ্রত্যাশীর সংখ্যা তুলনামূলক কম। এখন পর্যন্ত দুই হাসপাতাল মিলিয়ে আড়াই হাজারের কম রোগী এসেছে। জটিলতায় ভুগলেও সচেতন না হওয়া, দূরত্ব ও করোনা ডেডিকেটেড হাসপাতালের ভয়সহ নানা কারণে রোগীরা চিকিৎসকের পরামর্শ নিতে আসছে না। এতে অনেক রোগী সঠিক চিকিৎসা পাচ্ছে না বলে জানান চিকিৎসকরা।

শুরু থেকেই পোস্ট-কভিড ক্লিনিকে আসা ব্যক্তিদের চিকিৎসা দিয়ে আসছেন ঢামেকের মেডিসিন বিভাগের সহকারী অধ্যাপক ডা. মুহাম্মদ মাহফুজুল হক। তিনি বণিক বার্তাকে জানান, করোনা-পরবর্তী জটিলতা নিয়ে আগতদের মধ্যে শ্বাসকষ্ট, অনিয়ন্ত্রিত ডায়াবেটিস ও ফুসফুসের জটিলতা বেশি পাওয়া যায়। শ্বাসকষ্ট নিয়ে যারা আসছেন তাদের করোনায় আক্রান্ত হওয়ার আগে এ সমস্যা ছিল না। কভিড আক্রান্ত হওয়ার পর এসব জটিলতা দেখা দিয়েছে। মূলত অ্যান্টিবায়োটিক ও স্টেরয়েড-জাতীয় ওষুধের পার্শ্বপ্রতিক্রিয়া থেকেই এসব হচ্ছে।

এছাড়া অবসাদগ্রস্ততা, উচ্চ মানসিক চাপ, উদ্বিগ্নতা, উচ্চরক্তচাপ, হতাশা, অনিদ্রা, খাবারে অরুচি, দুর্বলতার কারণে রোগীরা পোস্ট কভিড ক্লিনিকে আসছে। ক্লিনিকে আসা ব্যক্তিদের বর্তমান অবস্থা ও ফলোআপ করে চিকিৎসা দেয়া হয়। শারীরিক সুস্থতার জন্য রিহ্যাবিলিটেশনের (শারীরিক চর্চা) জন্য পরামর্শ দেয়া হয়। করোনা থেকে সুস্থ হওয়ার পর কেউ কেউ ফুসফুসে মারাত্মক জটিলতায় ভুগছে বলে জানান বিএসএমএমইউর ইন্টারনাল মেডিসিন বিভাগের সহকারী অধ্যাপক ও ক্লিনিকের চিকিৎসক ডা. ফজলে রাব্বি চৌধুরী।

সরকারের রোগতত্ত্ব, রোগ নিয়ন্ত্রণ ও গবেষণা প্রতিষ্ঠানের (আইইডিসিআর) উপদেষ্টা ও সাবেক প্রধান বৈজ্ঞানিক কর্মকর্তা ডা. মুশতাক হোসেন বণিক বার্তাকে বলেন, করোনা নেগেটিভ হওয়ার বিষয়টি তাত্পর্যহীন। করোনা পজিটিভ হওয়া অনেকের মধ্যে উপসর্গ দেখা যায় না। কিছু মানুষের মধ্যে মৃদু উপসর্গ দেখা যায়। অনেকে নেগেটিভ হওয়ার পরও আইসিইউতে যাচ্ছে। নেগেটিভ হওয়ার সঙ্গে সুস্থতার সম্পর্ক নেই। করোনায় আক্রান্ত হওয়ার পর যেসব জটিলতা দেখা দেয়, তা কাটিয়ে উঠতে অনেক সময় লাগে।

এ রোগতত্ত্ববিদ জানান, করোনার ফলে সৃষ্ট জটিলতা কতদিন থাকে তা নিয়ে গবেষণা চলছে। এখন পর্যন্ত জানা গেছে, এ জটিলতা তিন থেকে পাঁচ বছর পর্যন্ত থাকতে পারে। করোনায় আক্রান্ত হওয়ার পর অতি মাত্রায় অ্যান্টিবায়োটিক, স্টেরয়েড-জাতীয় ওষুধ প্রয়োগসহ নানা কারণে জটিলতা দেখা দেয়। অনেক ক্ষেত্রে হাসপাতাল বা বাড়িতে চিকিৎসাধীন রোগীকে অতিমাত্রায় ওষুধ দেয়া হয়। ফলে সুস্থ হওয়ার পর চিকিৎসকের পর্যবেক্ষণে থাকতে হয়।

রাজধানীর দুটি হাসপাতাল বাদে অন্য কোথাও করোনা-পরবর্তী জটিলতার জন্য চিকিৎসার এমন বিশেষ ব্যবস্থা নেই বলে জানায় স্বাস্থ্য অধিদপ্তর। সংস্থাটি বলছে, করোনা শুরুর পর সরকারি হাসপাতালে পোস্ট-কভিড ক্লিনিক চালু করার জন্য নির্দেশনা দেয়া হয়নি। তবে হাসপাতালে এমন কেউ এলে তাদের ফিরিয়ে দেয়া হয় না। দেশে কভিড-১৯-এ আক্রান্ত হয়ে চিকিৎসা শেষে যারা নেগেটিভ হয়েছে, তাদের অনেকেই জটিলতায় ভুগছে। তবে এর সঠিক সংখ্যা ও জটিলতার ফলে মৃত্যুর কোনো হিসাব নেই। – বণিক বার্তা

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