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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

[১] সংক্রমণ বাড়লেও করোনা ভাইরাস দিন দিন দুর্বল হচ্ছে, জানালেন গবেষকরা

আব্দুল্লাহ মামুন: [২] ভাইরাস ইনস্টিটিউট ও বিশ্ববিদ্যালয়গুলোতে উন্নত মানের ল্যাব স্থাপনের দাবি জানিয়েছেন কোভিড গবেষণায় যুক্ত পাবলিক বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষকবৃন্দ।

[৩] বঙ্গবন্ধু শেখ মুজিবর রহমান কৃষি বিশ্ববিদ্যালয়ের জীব প্রযুক্তি ও জিন প্রকৌশলবিদ এবং বাংলাদেশ গবেষণা একাডেমির ফেলো ড. মো. তোফাজ্জল ইসলাম বলেন, মানব ইতিহাসে অবিস্মরণীয় ও ভয়ংকর ভাইরাস কোভিড-১৯ নিয়ে বৈশ্বিকভাবে গবেষণা অনেক এগিয়েছে। বাংলাদেশের তরুণ বিজ্ঞানীরা এ বিষয়ে প্রায় ১ হাজারের মতো গবেষণা প্রবন্ধ প্রকাশ করেছে। আমাদের গবেষণার বিষয়গুলো ছিলো জেনম সিকুয়েন্স করে অরগানিজমের পরিবর্তন ও গতিশীলতা এবং ভ্যারিয়েন্ট চিহ্নিতকরণ। এতে আমরা দেখছি, ভাইরাসটি একটা সিঙ্গেল স্ট্রেন্ডেড আরএনএ ভাইরাস। বায়োএনফোরমেটিক গবেষণা করে ভাইরাসটির বিবর্তন ও পরিবর্তন বুঝতে সক্ষম হয়েছি।

[৪] তিনি আরও বলেন, কম্পিউটারের সফটওয়্যার ব্যবহার করে এ্যান্টি ভাইরাল ড্রাগ ডিজাইন করতে হয়। এছাড়া কোভিড ১৯ ভাইরাস মানব দেহের অনান্য উপকারী অনুজীবের সঙ্গে মিথস্ক্রীয়ার ফলে কীভাবে অনুজীবগুলো নষ্ট করে এবং পরবর্তীতে সেই মানুষের দেহে অনুজীবগুলো কি অবস্থান ধারণ করে তা নিয়ে নানা রকমের গবেষণা করে নতুন জ্ঞান অর্জন করছি। তবে সমন্বিতভাবে জাতীয় পর্যায়ে কোনো গবেষণা হয়নি, যে গবেষণাগুলো হয়েছে সব ব্যক্তিগত ভাবে হয়েছে এবং জাতীয়ভাবে কোনো তহবিল গঠন করা বা কোনো প্রকল্প আহবান করা হয়নি যা অধিকাংশ দেশ করেছে।

[৫] ঢাবির সেন্টার ফর এ্যাডভান্সড রিসার্চ ইন সায়েন্সেস এর চিফ সায়েন্টিস্ট ড. মো. লতিফুল বারী বলেন, কোভিড ১৯ এর শুরু থেকে আমরা গবেষণা সেন্টার চালু রেখে সেবা প্রদান করছি। এছাড়া কোভিড-১৯ সম্পর্কে বিদ্যমান আতঙ্ক বা প্রশ্ন, সন্দেহ, কৌতুহলগুলোর উত্তর আমরা বের করেছি। যেমন; টাকার নোট ভাইরাস বহন করে তবে খুবই সীমিত সময়ের জন্য এবং সংক্রমিত করার মতো ভাইরাস সেখানে থাকতে পারে না। অর্থাৎ জীবন্ত বাহক ছাড়া ভাইরাস বেঁচে থাকতে পারে না।

[৬] তিনি আরও বলেন, কোভিড ১৯ এর পরিবর্তিত ভ্যারিয়েন্ট নির্ণয় ও সিকুয়েন্সিংয়ের মাধ্যমে ভাইরাস আরও শক্তিশালী না দুর্বল হচ্ছে তার তুলনামূলক গবেষণা করা হয়। মাইক্রোবায়োলজি বিভাগের সঙ্গে সমন্বয় করে গবেষণায় দেখা গেছে, করোনা সংক্রমণের হার বাড়ছে তবে ভাইরাসটি দিন দিন তুলনামূলক দুর্বল হচ্ছে।

[৭] ড. মো. লতিফুল বারী বলেন, কোভিড ১৯ নিয়ে স্বাস্থ্য মন্ত্রণালয়ে কিছু প্রকল্প জমা দেওয়া হয়েছে, ফান্ডের অপেক্ষায় গবেষণা কার্যক্রম শুরু হয়নি। বর্তমানে টিবি হাসপতাল, আইইডিসিআর, স্বাস্থ্যমন্ত্রণালয়ের সঙ্গে সমন্বয় করে গবেষণার উদ্যোগ নেয়া হয়েছে। আমাদের গবেষণাপত্রগুলো দেখলে বোঝা যাবে যে সমন্বয় করে গবেষণাপত্র প্রকাশ করা হয়।

[৮] তিনি আরও বলেন, গবেষণা তহবিলের সমস্যা সব জায়গায় হয় তবে আগের তুলনায় এখন গবেষণায় বরাদ্দসহ সকল সুযোগ সুবিধা বৃদ্ধি পেয়েছে। প্রতিবেশি দেশ ভারত অনেক আগে থেকেই গবেষণা খাতকে গুরুত্ব দেয়ায় তারা অনেকদূর এগিয়েছে।

[৯] যশোর বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয়ের সহকারি অধ্যাপক অভিনু কিবরিয়া ইসলাম বলেন, ২০২০ সালের এপ্রিল মাসে বাংলাদেশের প্রথম বিশ্ববিদ্যালয় হিসেবে করোনা পরীক্ষা শুরু করে যবিপ্রবি। এখনো করোনা পরীক্ষা চালু আছে। এ পর্যন্ত প্রায় ৬০ হাজার নমুনা পরীক্ষা করা হয়েছে।

[১০] বাংলাদেশের প্রথম বিশ্ববিদ্যালয় হিসেবে নিজস্ব ল্যাবে করোনার পূর্ণাঙ্গ জিনোম সিকুয়েন্স করতে সক্ষম হয় যবিপ্রবি। এ পর্যন্ত ২২টি পূর্নাঙ্গ জিনোম সিকুয়েন্স এবং শতাধিক পার্শিয়াল জিনোম সিকুয়েন্স করা হয়েছে। গত ৮ মে বাংলাদেশে করোনার ভারতীয় ধরণ বা ডেল্টা ভ্যারিয়েন্ট সনাক্ত করে যশোর বিজ্ঞান প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয় গবেষকদল। এছাড়া মে মাসের শেষ সপ্তাহে ভারতে না গিয়েও কমিউনিটি সংক্রমণের মাধ্যমে ডেল্টা ভ্যারিয়েন্টে সংক্রমিত হবার তথ্যও তারা জানায় ।

[১১] যশোর বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয় নিয়মিত কম্পলিট ও পার্শিয়াল সিকুয়েন্সিং এর মাধ্যমে করোনার নতুন ধরনগুলো শনাক্তের কাজ করে যাচ্ছে। শুধু করোনার জিনোম সিকুয়েন্সিং নয়, করোনা আক্রান্তদের নমুনা থেকে মেটা জিনোম সিকুয়েন্সিং এর মাধ্যমে কোইনফেকশন সনাক্ত করার কাজও করেছে তারা।

[১২] যশোর বিজ্ঞান ও প্রযুক্তি বিশ্ববিদ্যালয় গবেষকদের বিভিন্ন গবেষণা আন্তর্জাতিক বিভিন্ন জার্নালে প্রকাশিত হয়েছে এবং অনেক প্রতিবেদন প্রকাশের অপেক্ষায় রয়েছে। বাংলাদেশসহ দক্ষিণ পূর্ব এশিয়ার সংক্রমণ সৃষ্টিকারী ভাইরাসের জিনোম সিকুয়েন্স বিশ্লেষণের মাধ্যমে এর গতিপ্রকৃতি সম্পর্কিত গবেষণা, জিনোম সিকুয়েন্সিং ছাড়াই বিশেষ এআরএমএস পিসিআরের মাধ্যমে করোনার বিভিন্ন ক্ল্যাড সনাক্ত করার পদ্ধতি, বাংলাদেশের ব্যাংকনোটে করোনা ভাইরাসের আরএনএ’র উপস্থিতি সংক্রান্ত গবেষণা, করোনা আক্রান্ত রোগীদের ইমিউনো রেসপন্স সংক্রান্ত গবেষণা ইতোমধ্যেই আন্তর্জাতিক জার্নালে প্রকাশিত হয়েছে।

[১৩] এছাড়া সাইবারগ্রিন পদ্ধতিতে কম খরচে করোনা সনাক্তের কার্যকারিতা সম্পর্কিত গবেষণা, মেটাজিনোম সিকুয়েন্সিং এর মাধ্যমে করোনা আক্রান্ত কো-মরবিড রোগীদের প্যাথোজেনিক প্রোফাইল সংক্রান্ত গবেষণা, ২০২০ সালে সারা বিশ্বে সংক্রমণ সৃষ্টকারী ভাইরাসের ধরণ ও মিউটেশন নিয়ে বিশ্লেষণধর্মী গবেষণা প্রকাশের অপেক্ষায় আছে। ভ্যাক্সিনেটেড ও নন ভ্যাক্সিনেটেড রোগীদের উপর করোনা ভাইরাসের কোন ধরন কেমন প্রভাব ফেলছে তা নিয়ে এখন গবেষণা চলছে।

[১৪] চট্রগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়ের গবেষণা সেলের প্রধান ড. আব্দুল্লাহ্ আল ফারুক বলেন, গবেষণায় সর্বমোট বরাদ্দ ৩ কোটি ৬০ লাখ টাকা, এরমধ্যে করোনার জন্য বিশেষ বরাদ্দ ১ কোটি টাকা দেওয়া হয়, বাকি ২ কোটি ৬০ লাখ টাকা অনান্য গবেষণার জন্য। ২০২০-২১ অর্থবছরে গবেষণায় বিশেষ বরাদ্দে করোনা সম্পর্কিত ৩৭ টি প্রকল্প চলমান আছে। মোট ১২৪টি প্রকল্পের মধ্যে প্রায় ৪০টি কোভিড ১৯ সম্পর্কিত। চলমান প্রকল্পের মধ্যে ৩০টি প্রকল্পের গবেষণাপত্র জমা হয়েছে।

[১৫] তিনি আরও বলেন, গবেষণার জন্য যে তহবিল দেওয়া হয় তা পর্যাপ্ত নয়। পর্যাপ্ত ইকুইপমেন্ট, ল্যাব ম্যাটেরিয়ালস নেই। এছাড়া গবেষণা করার মতো যথেষ্ট সুযোগ-সুবিধা অনেক বিভাগে নেই যা অনেক বড় ধরনের প্রতিবন্ধকতা তৈরি করে। উল্লেখযোগ্য আরেকটি বিষয় হচ্ছে সহযোগীতামূলক গবেষণা কম হচ্ছে, কোন বিশ্ববিদ্যালয় কি ধরনের গবেষণা করছে তা সমন্বয় করলে গবেষণায় ভালো ফলাফল পাওয়া যাবে। তবে ব্যাক্তিগত ভাবে অনেকে শিক্ষক ভালো গবেষণা করছে এবং অনেক ভালো ভালো জার্নালে তা প্রকাশিত হচ্ছে।

[১৬] ফারুখ বলেন, এখানে বিজ্ঞান বিষয়ক গবেষণার পাশাপাশি সোশ্যাল সাইয়েন্সসহ বিভিন্ন বিষয়ে গবেষণা করা হয়। তবে গত বছরের ন্যায় কোভিড ১৯ কে গুরুত্ব দিয়ে এবারও বিশেষ বরাদ্দ ১ কোটি টাকা দেওয়া হয় যা আরও বাড়ানো উচিত। বিশ্বে বড় বড় বিভিন্ন গবেষণা প্রকল্পে মিলিয়ন ডলার বরাদ্দ দেওয়া হয় অনুরূপ বৈশ্বিক মহামারি করোনার জন্য বরাদ্দ ও সহোযোগীতা আরো বৃদ্ধি করতে হবে।

[১৭] চট্রগ্রাম বিশ্ববিদ্যালয়ের গবেষক ড. রবিউল ভূইঁয়া বলেন, গবেষণা সেল থেকে প্রথমে ৫ লাখ টাকা বরাদ্দ দেওয়া হয়। জেনম সিকুয়েন্সিং করতে পুরো চট্রগ্রাম বিভাগের ১১ টা জেলা সেম্পল সংগ্রহ করতে হয় অর্থাৎ জেনম সিকুয়েন্সিং করা অনেক ব্যয়বহুল প্রজেক্ট। এই প্রজেক্টটি দুই ভাগ ভাগ করে প্রায় ১৫-২০ লাখ টাকায় রিএজেন্ট, ক্যামিকেলসহ সবকিছু করা হয়।

[১৮] তিনি আরও বলেন, গবেষণায় বরাদ্দ জটিলতার পাশাপাশি সময় মতো বরাদ্দ না পাওয়া গেলে পরে দিয়ে তো লাভ নেই। গবেষণায় পর্যাপ্ত ও সময়মতো অর্থ প্রয়োজন। গবেষণা ছাড়া কোনো দেশ উন্নতির শিখরে পৌছাতে পারে না যেমন; জাপান, জার্মান, আমেরিকাসহ ইউরোপের দেশগুলো।

[১৯] ড. রবিউল ভূইঁয়া বলেন, জেনম সিকুয়েন্স এর শুরুতে কিট ব্যবহার করে সুফল পওয়া যায়নি, পরবর্তীতে আবার উন্নত মানের কিট নিয়ে আসা হয়। গবেষণায় নতুন করে কোনো প্রভাব না পরে সেজন্য আবার ওই ১১টি জেলায় নতুন স্যাম্পল সংগ্রহ করা হয়। ১১ টি জেলার জ্বীনের জেনম সিকোয়েন্স দিয়ে আমেরিকার ডাটাবেজে অনুযায়ী সাবমিট করা হয় ও তথ্য যাচাই করে ২ দিন পর কনফারমেশন দেয়। সেই প্রতিবেদনগুলো বিশ্ববিদ্যালয় নামিয়ে ৩৩ টা আউট লেটে প্রকাশ করা হয়।

[২০] তিনি আরোও বলেন, জেনম সিকুয়েন্স নিয়ে গবেষণা করতে প্রায় ১৮-২০ লাখ টাকা প্রয়োজন হয় এরপরও চ্যালেঞ্জ নিয়ে গবেষণার কাজটি শুরু করা হয়।

 

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