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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

চাকরির বাজারেও মহামারি করোনার থাবা

সমকাল: রাজশাহী বিশ্ববিদ্যালয়ের আইন বিভাগের ২০১৪-১৫ শিক্ষাবর্ষের শিক্ষার্থী মঈন উদ্দিন। ২০১৯ সালের মাস্টার্স ব্যাচের ছাত্র তিনি। সরকারি চারটি দপ্তরের নিয়োগ বিজ্ঞপ্তি দেখে আবেদন করেছেন। মহামারি করোনার কারণে একটিরও নিয়োগ পরীক্ষা হয়নি। স্থগিত হয়ে আছে চারটি নিয়োগ প্রক্রিয়াই। অন্যদিকে, একই কারণে (করোনা) মঈনের একাডেমিক পড়াশোনাও শেষ হয়নি। গত বছরের জুনে মাস্টার্স পরীক্ষা হওয়ার কথা ছিল তার। তবে করোনাভাইরাস সংক্রমণের মুখে দেশের সব শিক্ষাপ্রতিষ্ঠান বন্ধ হয়ে যাওয়ায় সে সময় পরীক্ষা হয়নি। চলতি বছরের ফেব্রুয়ারিতে পরীক্ষা শুরু হয়েছিল। তবে সংক্রমণ ঊর্ধ্বমুখী হওয়ায় মার্চে সব ধরনের পরীক্ষা স্থগিত রাখার নির্দেশ দেয় শিক্ষা মন্ত্রণালয়। এতে আবারও পিছিয়ে যায় মঈন উদ্দিনের মাস্টার্স পরীক্ষা।

এখনও তার তিনটি পরীক্ষা আটকে আছে। কবে নাগাদ বিশ্ববিদ্যালয় খুলে দেওয়া হবে জানা নেই তার।

মঈন বলেন, ‘আমাদের কষ্ট কাউকে বোঝানোর নয়। বিশ্ববিদ্যালয়ে পরীক্ষাজট, চাকরির বাজারেও পরীক্ষার জট। জীবনের মূল্যবান সময়গুলো শুধু শুধু নষ্ট হচ্ছে।

তিনি জানান, চার জায়গায় আবেদন করে একটি পরীক্ষাও দিতে পারেননি। গত জানুয়ারিতে ১৪তম জুডিশিয়াল সার্ভিস কমিশনের (সহকারী জজ পদে) নিয়োগ সার্কুলার হয়। আগে মাসখানেকের মধ্যে পরীক্ষা হতো। এবার এখনও হয়নি। মহাহিসাব নিরীক্ষক ও নিয়ন্ত্রক অধিপ্তরে অডিটর, জাতীয় নিরাপত্তা গোয়েন্দা সংস্থার (এনএসআই) সহকারী পরিচালক, সরকারি প্রাথমিক বিদ্যালয়ের সহকারী শিক্ষক পদে আবেদন করেছেন মঈন।

মইন বলেন, করোনার পর হয়তো অনেক নিয়োগ পরীক্ষা হবে। কিন্তু দ্রুত সময়ে একাধিক নিয়োগ পরীক্ষা হলে প্রস্তুতি নেওয়ার সময়ও থাকবে না। সব মিলিয়ে বলা যায়, করোনার কারণে গত দেড় বছর ধরে দুশ্চিন্তা ও হতাশায় কাটছে সময়।

রাজিবুল আলম খান তানিম ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের দর্শন বিভাগ থেকে মাস্টার্স পাস করেছেন ২০১৯ সালে। মাস্টার্স শেষ করার পর আবেদন করেছেন বিভিন্ন সরকারি চাকরিতে। চাকরির পরীক্ষাগুলো স্থগিত থাকায় হতাশ। তিনি বলেন, বয়স বেড়ে যাচ্ছে। এখনও বেকার। বাবা-মা আমাকে নিয়ে দুশ্চিন্তায় আছেন। ঘুরতে-ফিরতে চারপাশের সবাই জিজ্ঞেস করেন, কী করো, চাকরি-বাকরি কিছু হলো? সমাজে চলাও এখন কষ্টকর হয়ে দাঁড়িয়েছে।

জাতীয় বিশ্ববিদ্যালয়ের অধিভুক্ত একটি কলেজের ২০১০-১১ সেশনের শিক্ষার্থী আব্দুল্লাহ আল মামুন বলেন, সরকার গত বছর সরকারি চাকরির ক্ষেত্রে পাঁচ মাস বয়স সমন্বয় করার যে কথা বলেছিল, তা শুধু তৃতীয় ও চতুর্থ শ্রেণির কর্মচারী নিয়োগের ব্যাপারে মানা হয়েছে। কর্মকর্তা পদে মানা হয়নি। বাংলাদেশ ব্যাংকে গত বছর কর্মকর্তা পদে চাকরির যে নিয়োগ বিজ্ঞপ্তি দেওয়া হয়, তাতে বয়স সমন্বয় করা হয়নি। এতে করোনার কারণে আমাদের যে সময় নষ্ট হলো, সে বিষয়ে কোনো ব্যবস্থা নেওয়া হয়নি। করোনাকালের পুরোটা সময়ই নষ্ট হয়েছে।

২০১৯ সালে রাজশাহী বিশ্ববিদ্যালয়ের গণযোগাযোগ ও সাংবাদিকতা বিভাগ থেকে মাস্টার্স পাস করা রাহিনুল ইসলাম রিংকু বলেন, প্রায় দেড় বছর করোনার কবলে দেশ। এই সময়ে অনেক বড় বড় নিয়োগ বিজ্ঞপ্তি প্রকাশ হয়েছে। কিন্তু তেমন কোনো নিয়োগ পরীক্ষা হয়নি। আমরা এই সময়ে শুধু ৪১তম বিসিএস দিতে পেরেছি। বাংলাদেশ ব্যাংকে সহকারী পরিচালক, রাজশাহী কৃষি উন্নয়ন ব্যাংকের হিসাবরক্ষক, বাংলাদেশ ব্যাংকের অধীনে সমন্বিত কয়েকটি (রাষ্ট্রায়ত্ত) ব্যাংকে সিনিয়র অফিসার পদে আবেদন করা আছে, কিন্তু কোনো নিয়োগ পরীক্ষা হচ্ছে না। এর বাইরেও এনএসআই, শিক্ষা প্রকৌশল অধিদপ্তরসহ আরও অনেক সরকারি প্রতিষ্ঠানে নিয়োগ বিজ্ঞপ্তি প্রকাশিত হলেও নিয়োগ পরীক্ষা সব স্থগিত হয়ে রয়েছে।

তিনি বলেন, দেশে বেকারত্বও বাড়ছে। দেশে লাখ লাখ শিক্ষিত বেকার রয়েছে। নিয়োগ পরীক্ষাগুলো আটকে থাকার পর একবারে শুরু হলে তখন আরও বেশি প্রতিযোগী তৈরি হবে। এতে করে বেকারত্ব আরও ভয়াবহ হবে।

জাহাঙ্গীরনগর বিশ্ববিদ্যালয়ের নৃবিজ্ঞান বিভাগের মাস্টার্সের শিক্ষার্থী মো. শামীম বলেন, আসলে সব মিলিয়ে একটা অস্বাভাবিকতার ভেতরে আছি। দীর্ঘদিন শিক্ষাপ্রতিষ্ঠান বন্ধ। এদিকে চাকরির সার্কুলার হচ্ছে, কিন্তু পরীক্ষাগুলো কবে হবে তা নিয়ে সবাই সন্দিহান। ক্যাম্পাস খোলা থাকলে হয়তোবা লেখাপড়া এবং সবকিছু মিলিয়ে একটা গোছানো প্রস্তুতি থাকত, যা এখন আর হচ্ছে না। একটা মানসিক ট্রমার মধ্যে আছি।

একই বিশ্ববিদ্যালয়ের বাংলা বিভাগের মাস্টার্সের শিক্ষার্থী রাজিয়া অর্পা ফেন্সি বলেন, মহামারির কারণে নিয়োগ সার্কুলারও কমেছে। বেসরকারি খাতেও কোনো সার্কুলার নেই, কোনো চাকরির পরীক্ষা নেই। এই মহামারি কবে শেষ হবে, কেউ জানে না। যতদিন যাচ্ছে পরিবারের জন্য বোঝা হয়ে যাচ্ছি।

যেসব নিয়োগ পরীক্ষা আটকে গেছে :করোনায় আক্রান্ত রোগীদের চিকিৎসা দিতে স্বাস্থ্য ক্যাডারে দুই হাজার সহকারী সার্জন দ্রুত নিয়োগের জন্য ৪২তম (বিশেষ) বিসিএসের আয়োজন করেছিল সরকার। এই নিয়োগের মৌখিক পরীক্ষাও আটকে গেছে করোনার কারণে। মহামারির কারণে আটকে পড়া এই পরীক্ষা নিতে গত ২৩ মে নতুন সূচি দিয়েছিল পাবলিক সার্ভিস কমিশন (পিএসসি)। গত ৬ জুন মৌখিক পরীক্ষা নেওয়া শুরু হয়। আগামী ১৩ জুলাই পর্যন্ত এতে ৬ হাজার ২২ জন প্রার্থীর অংশ নেওয়ার কথা ছিল। ২২ জুন পিএসসি জানায়, ২৭ জুন থেকে এ পরীক্ষা স্থগিত থাকবে। ঢাকার সঙ্গে অন্য জেলার যোগাযোগ বিচ্ছিন্ন হওয়ার কারণেই মূলত মৌখিক পরীক্ষাগুলো স্থগিত করা হয়।

পিএসসির চেয়ারম্যান মো. সোহরাব হোসাইন ২৩ জুন বলেন, যত পরীক্ষা আছে ইতোমধ্যে সব স্থগিত করা হয়েছে। পরিস্থিতি বুঝে সিদ্ধান্ত নেওয়া হবে। করোনা পরিস্থিতির অবনতি ঘটলে কোনো পরীক্ষাই আমাদের পক্ষে নেওয়া সম্ভব হবে না। কারণ, আমাদের পরীক্ষার্থীরা সারাদেশ থেকে আসে। চেয়ারম্যান জানান, ৪২তম বিসিএসের মৌখিক পরীক্ষা ছাড়াও বড় ধরনের মোট তিনটি নিয়োগ পরীক্ষা স্থগিত করতে হয়েছে। এছাড়া সরকারি কর্মচারী কল্যাণের নার্স নিয়োগ পরীক্ষাও স্থগিত করা হয়েছে।

পিএসসির বাইরে বাংলাদেশ ব্যাংকের সহকারী পরিচালক, কর্মকর্তা, সমন্বিত ৮টি ব্যাংকের কয়েকশ পদে সিনিয়র অফিসার ও অফিসার (ক্যাশ), প্রবাসী কল্যাণ ব্যাংকের সিনিয়র অফিসার, অফিসার (ক্যাশ), জাতীয় নিরাপত্তা গোয়েন্দা সংস্থার (এনএসআই) সহকারী পরিচালক, সরকারি প্রাথমিক বিদ্যালয়ের সহকারী শিক্ষক (৩৪ হাজারের বেশি পদে), সিলেট গ্যাস ফিল্ডের প্রকৌশলী ও কর্মকর্তা, পেট্রোবাংলায় সহকারী ব্যবস্থাপকসহ কর্মকর্তাদের কয়েকটি পদ, তিতাস গ্যাস ফিল্ডের কর্মকর্তা, মহাহিসাব নিরীক্ষক ও নিয়ন্ত্রক অধিপ্তরে অডিটর, রাজশাহী কৃষি উন্নয়ন ব্যাংক, বাংলাদেশ কেমিক্যাল ইন্ডাস্ট্রিজ করপোরেশন, রেলওয়ের সহকারী স্টেশন মাস্টার, বেসরকারি বিমান চলাচল কর্তৃপক্ষের ১০টি গ্রুপে কয়েকশ পদে, শিক্ষা প্রকৌশল অধিদপ্তরের কয়েকটি পদে কয়েকশ পদে, বাংলাদেশ জুডিশিয়ারি সার্ভিস কমিশনের সাব জজ পদ (১০০ জন), বাংলাদেশ পাট গবেষণা ইনস্টিটিউটের কয়েকটি পদসহ সরকারি কর্মকমিশনের বিজ্ঞপ্তি দেওয়া আরও বেশ কিছু পদের নিয়োগ পরীক্ষার তারিখ ঘোষণা করেও পরে তা স্থগিত করতে হয়েছে।

তিন লাখ ৮১ হাজার সরকারি পদ শূন্য :একদিকে সব নিয়োগ পরীক্ষা স্থগিত, চাকরিপ্রার্থীর ভিড় বাড়ছে, অন্যদিকে প্রতি মাসেই সরকারি কর্মকর্তা-কর্মচারীরা অবসরে যাচ্ছেন, পদ শূন্য হচ্ছে। বর্তমানে জনপ্রশাসনে প্রায় চার লাখ সরকারি পদ শূন্য রয়েছে। প্রশাসনে ২০২০ সালের ৩১ ডিসেম্বর পর্যন্ত মোট অনুমোদিত পদের সংখ্যা ১৮ লাখ ৮৫ হাজার ৮৬৮। এর মধ্যে ১৫ লাখ ৪ হাজার ৯১৩টি পদে লোকবল থাকলেও বর্তমানে প্রশাসনে তিন লাখ ৮০ হাজার ৯৫৫টি পদ শূন্য।

গত ১৫ জুন প্রকাশ করা জনপ্রশাসন মন্ত্রণালয়ের সংস্কার ও গবেষণা অনুবিভাগের পরিসংখ্যান ও গবেষণা কোষ ‘স্ট্যাটিসটিকস অব সিভিল অফিসার্স অ্যান্ড স্টাফস-২০২০’ বই থেকে এ তথ্য জানা যায়। ২০২০ সালের জনপ্রশাসনের কর্মকর্তা-কর্মচারীদের পরিসংখ্যান নিয়ে বইটি রচিত হয়েছে।

জনপ্রশাসন মন্ত্রণালয় জানিয়েছে, বর্তমানে শূন্য পদের মধ্যে ৪৬ হাজার ৬০৩টি প্রথম শ্রেণির, ৩৯ হাজার ২৮টি দ্বিতীয় শ্রেণির, এক লাখ ৯৫ হাজার ৯০২টি তৃতীয় শ্রেণির এবং ৯৯ হাজার ৪২২টি চতুর্থ শ্রেণির। সরকারের সাবেক সচিব মো. আকরাম আল হোসেন বলেন, শূন্য এসব পদে দ্রুত জনবল নিয়োগ করা গেলে বিপুল সংখ্যক বেকারের সরকারি কর্মসংস্থানের ব্যবস্থা হয়ে যেত।

চাকরির বয়স বাড়ানোর দাবি :করোনাকালীন ক্ষতিগ্রস্ততা বিবেচনায় সরকারি চাকরিতে প্রবেশের বয়স স্থায়ীভাবে ৩২ করার দাবি জানিয়ে আসছে চাকরিপ্রার্থীদের প্ল্যাটফর্ম ‘সরকারি চাকরিপ্রত্যাশী যুব প্রজন্ম-৩২’। দাবি আদায়ের অংশ হিসেবে ইতোমধ্যেই তারা একাধিকবার স্মারকলিপি জমা, সংবাদ সম্মেলন, গণস্বাক্ষর, মানববন্ধন, সংসদ ভবন এলাকায় মৌন সমাবেশ করেছেন। সর্বশেষ গত ১১ জুন শাহবাগে এই দাবিতে জনসমাবেশ করতে গেলে পুলিশের বাধার শিকার হন তারা।

প্ল্যাটফর্মের নেতারা বলেন, করোনাকালীন অচলাবস্থায় সকল বয়সের শিক্ষার্থী-চাকরিপ্রত্যাশীরা ইতোমধ্যেই দেড় বছর হারিয়ে ফেলেছে। আরও কতোদিন এভাবে যাবে জানা নেই। চাকরিপ্রার্থী লাখ লাখ তরুণ-তরুণী করোনার শুরুর সময়ে যাদের বয়স ২৮ বছরের বেশি ছিল, তারা চাকরির পরীক্ষায় অবতীর্ণ হওয়ার সুযোগ না পেয়েই ৩০-এর গণ্ডি অতিক্রম করতে চলেছেন।

হতাশার চিত্র এসেছে গবেষণাতেও :ব্র্যাক ইনস্টিটিউট অব গভর্ন্যান্স অ্যান্ড ডেভেলপমেন্ট (বিআইজিডি) থেকে গত ২২ জুন প্রকাশ করা এক গবেষণা প্রতিবেদনে বলা হয়েছে, করোনা মহামারি দেশের তরুণ-তরুণীদের মানসিক স্বাস্থ্যের ওপর প্রভাব ফেলেছে। তরুণ-তরুণীরা জীবন ও জীবিকা সংক্রান্ত বিভিন্ন চ্যালেঞ্জ নিয়ে ব্যতিব্যস্ত থাকায় তাদের মানসিক স্বাস্থ্যের অবনতি হচ্ছে। জরিপ অনুযায়ী প্রথম লকডাউনের সময়ে ঘিরে থাকা বিষণ্ণতা এবং উদ্বিগ্নতা ১২ শতাংশ তরুণ এবং এক-পঞ্চমাংশ তরুণীর মধ্যে চলতি বছরের জানুয়ারিতেও বিরাজমান। এতে আরও বলা হয়, মহামারির আগে চাকরিতে নিযুক্ত থাকলেও দেশের তরুণ-তরুণীর ১৫ শতাংশ মহামারির পর কর্মহীন হয়েছে। পাশাপাশি কাজের সুযোগ কমে যাওয়ায় শ্রমবাজারে ইতোমধ্যে তারা চ্যালেঞ্জের মুখে পড়েছে। মহামারিকালীন তরুণদের জন্য প্রতিযোগিতা আরও কঠিন হয়েছে।

বিআইজিডি চলতি বছরের জানুয়ারিতে দেশের তরুণ-তরুণীদের ওপরে একটি জরিপ পরিচালনা করে। সেই জরিপে এসব তথ্য উঠে আসে। জরিপে দেখা গেছে, শহরাঞ্চলের তরুণদের আয়ে বেশ বড় রকমের ধাক্কা লেগেছে, ১৫ শতাংশ আয় কমেছে তাদের। সে তুলনায় গ্রামাঞ্চলের তরুণদের আয় কমেছে ৯ শতাংশ পর্যন্ত। নারীর অবস্থা আরও আশঙ্কাজনক। মহামারির আগে চাকরিরত তরুণীদের এক-তৃতীয়াংশ ২০২১ সালের জানুয়ারিতে তাদের চাকরি হারিয়েছেন। চাকরি হারানোর এই হার তরুণদের চেয়ে তিন গুণ বেশি।

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