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প্রচ্ছদ

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লিটন নন্দি: শতবর্ষের এই ক্ষণে কিছু স্বপ্ন শব্দে রুপান্তরিত করে যাচ্ছি আপনাদের সামনে

লিটন নন্দি: সদ্য কৈশোর উত্তীর্ণ হয়ে মায়ের কাছ থেকে ৫০০ টাকা নিয়ে সুন্দরবন গাড়িতে চড়ে বাগেরহাট থেকে প্রথমবারের মত রাজধানীতে এসেছিলাম ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয় দেখবো বলে। বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রেমে এতটাই মোহগ্রস্থ ছিলাম যে, সমস্ত রাত বাসে কেটেছিলো অনিদ্রায়-উত্তেজনায়! পরের দিন প্রাতে বিশ্ববিদ্যালয়ে যখন হাটছিলাম, তখন ইন্টারমিডিয়েটে পড়া আমার কাছে বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রতিটি শিক্ষার্থীকে মনে হচ্ছিল এক একজন দেবদূত!

অনেক চড়াই উৎরাই পেরিয়ে ভর্তি হলাম ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে। প্রথম কিছুদিন মন্ত্রমুগ্ধ হয়ে হয়ে ঘুরে বেড়াচ্ছিলাম কলাভবন, লেকচার থিয়েটার, কার্জন হল, মধুর ক্যান্টিন। ধীরে ধীরে আমার আকাশ ছোয়া স্বপ্ন ও ফ্যান্টাসি জমিনে নামতে লাগলো। দেখলাম- এখানে শুধু স্বপ্নের বুনন নয়; আছে স্বপ্ন স্বপ্ন খেলা, আছে স্বপ্নের কেনাবেচা! দিনশেষে এই বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রতিটি জমিনের কাছে, প্রতিটি মানুষ(চা বিক্রেতা, কর্মচারী, কর্মকর্তা, শিক্ষক, সহযোদ্ধা, প্রিয় প্রতিপক্ষ) এর কাছে আমি ভীষণ ভাবে কৃতজ্ঞ। এই বিশ্ববিদ্যালয়ের জমিনে বসেই আমি শিখেছি- ‘জীবন-জীবনের ঘুন’।

ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের প্রতিষ্ঠা কোন মামুলি ঘটনা ছিলোনা। তৎকালীন পূর্ব বাঙলার জনগণের আকাঙ্ক্ষাকে ধারণ করে প্রতিষ্ঠা হয় ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়। জনগণের আকাঙ্ক্ষার দাম এই বিশ্ববিদ্যালয় পদে পদে মিটিয়েছে। অনেকেই বলে থাকেন, এই বিশ্ববিদ্যালয়ের রাজনৈতিক অর্জন আছে কিন্তু উল্লেখযোগ্য একাডেমিক অর্জন নেই। আমার মতে, বিশ্ববিদ্যালয়ের একাডেমিক চিন্তা সমাজ রাষ্ট্র বহির্ভূত নয়। এই রাষ্ট্রের প্রতিটি কাঠামোতে যখন ঘুন ধরছে, তখন বিশ্ববিদ্যালয়ও এর বাইরে থাকতে পারেনি। শত বর্ষের এইক্ষনে আমি কৃতজ্ঞতা জানাতে চাই দেশের আপামর জনসাধারণকে; যাঁরা তাঁদের কষ্টার্জিত অর্থ দিয়ে ভরন-পোষণ করে চলছেন এই বিশ্ববিদ্যালয়কে। সর্বজন এখনো অন্তরে ক্ষীণ আশা পোষণ করেন যে, এই বিশ্ববিদ্যালয় পাট চাষী ও শ্রমিকের দুঃখে ব্যথিত হবেন, ব্যথিত হবেন সুন্দবনের কাঁন্নায়!

আমি যখন বিশ্ববিদ্যালয়ের জমিনে হাটতাম কিংবা এখনো যখন হাটি, প্রভূত চিন্তা আমার মস্তিষ্কে খেলা করে যায়। স্বপ্নের রঙ তুলিতে আঁকি বিশ্ববিদ্যালয়ের বিভিন্ন স্তম্ভ। শতবর্ষের এই ক্ষণে কিছু স্বপ্ন শব্দে রুপান্তরিত করে যাচ্ছি আপনাদের সামনে।

১ঃ বিশ্ববিদ্যালয়ের ভর্তি পরীক্ষা হবে ভার্বাল, ম্যাথমেটিকাল ও এনালেটিক্যাল বেইজড; মুখস্ত পয়েন্ট নির্ভর নয়। এই তিনটি বিষয় শিক্ষার্থীদের নয় ধরনের বুদ্ধিমত্তাকে কিছুটা হলেও স্পর্শ করে।

২ঃ বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষার্থীরা চার বছরের অনার্স শেষে আবার মাস্টার্সের ভর্তি পরীক্ষায় বসবে। যে কোন বিশ্ববিদ্যালয় বা কলেজের স্নাতক শেষ করা শিক্ষার্থী মাস্টার্সের ভর্তি পরীক্ষায় অংশগ্রহণ করতে পারবে। কলা ও সামাজিক বিজ্ঞান অনুষদের সকল সাবজেক্ট, আইন, এমবিএতে সকল শিক্ষার্থী চাইলে মাস্টার্স করতে পারবে। সান্ধ্যকালীন বা উইকেন্ড কোন নামেই বানিজ্যিক মাস্টার্স কোর্স চলবে না। বিদ্যমান ব্যবস্থায় অর্থনীতির একজন শিক্ষার্থী চাইলেও দর্শনে মাস্টার্স করতে পারেনা।

৩ঃ “ছয় বছরের মধ্যে অনার্স ও দুই বছরের মধ্যে মাস্টার্স ” এই ধরনের গন্ডিবদ্ধ কোন বিষয় থাকবে না। নন কলেজিয়েট বা ডিস কলেজিয়েট নামক কোন প্রথা থাকবে না। প্রতি সেমিষ্টারে শিক্ষক মূল্যায়ন পদ্ধতি চালু থাকবে।

৪ঃ “অনার্সে ভর্তির ক্ষেত্রে পরীক্ষায় বসার সুযোগ একবারই থাকবে” -এই ধরনের আজগুবি কোন প্রথা থাকবে না। পৃথিবীর কোন দেশে এমনকি পার্শ্ববর্তী দেশ ভারতের কোন বিশ্ববিদ্যালয়ে এই ধরনের নিয়ম দেখতে পাইনা।

৫ঃ প্রতি শিক্ষাবর্ষের দুই সেমিষ্টার শেষে ২০০ মার্কসের ভাইবা থাকবে। ভাইবা কেন্দ্রীক মার্কসের জিম্মিদশা রুখতে ভাইবা নিবেন প্রতিটা বিভাগের ৫/৬ জন অভিজ্ঞ শিক্ষকমন্ডলী। প্রতি শিক্ষাবর্ষের শুরুতে দুই সেমিষ্টার মিলিয়ে নূন্যতম ৫০টি রেফারেন্স বইয়ের তালিকা থাকবে। ভাইবার ক্ষেত্রে এই পঞ্চাশটি বইও অন্তর্ভুক্ত থাকবে।

৬ঃ বিশ্ববিদ্যালয়ের সকল মাস্টার্স হবে দুই বছরের। শেষ সেমিষ্টার থাকবে পুরোটাই ফিল্ড রিসার্চ কেন্দ্রীক।

৭ঃ ২৪ ঘন্টা লাইব্রেরি খোলা থাকবে। লাইব্রেরি একাডেমিক ও রিসার্চ কেন্দ্রীক পড়ালেখার জন্য উন্মুক্ত থাকবে।

৮ঃ প্রথম বর্ষ থেকেই প্রতিটা শিক্ষার্থীর আবাসন সুবিধা থাকবে। “ক্ষমতাসীন দল হলের সিটের ভাগীদার” এই ধরনের অসভ্য ব্যবস্থা থাকবে না। প্রতিটা শিক্ষার্থীর নিজের চিন্তা লালন ও প্রকাশের সুযোগ থাকবে।

৯ঃ ছেলে-মেয়ে উভয়ের হল বন্ধের কোন সীমারেখা থাকবে না। ক্যাম্পাসের চারপাশে নিরাপত্তা জোরদার করে শিক্ষার্থীদের উন্মুক্ত বিচরণের সুযোগ থাকবে।

১০ঃ অনার্সের শুরুতে সকল অনুষদের সকল শিক্ষার্থীর নবীন বরণ একসাথে খেলার মাঠে হবে। সেখানে নবীন বরণ বক্তা হিসেবে থাকবেন একাডেমিক স্কলার, কৃষক, বাউল সাধক। বিশ্ববিদ্যালয়ের ধারণা ও পথরেখা নবীন শিক্ষার্থীরা অর্জন করবে।

১১ঃ বাসায় অবস্থানরত শিক্ষার্থীদের জন্য রাত ৯ টা পর্যন্ত বাস চলবে। যাতে করে শিক্ষার্থীরা ক্লাশ শেষে আড্ডা, সামাজিক-সাংস্কৃতিক চর্চা করতে পারে। আর প্রতিটা রুটে শিক্ষার্থী বিবেচনায় প্রয়োজনীয় বাস থাকবে। “নিচতলায় মেয়েরা উপরের তলায় ছেলেরা” এমন হাস্যাস্পদ কোন রীতি এক্সিস্ট করবে না।

১২ঃ টিএসসি, পলাশী, বসনিয়া চত্বর, মেডিকেলের মোড়ে সারা দিনরাত চায়ের দোকান খোলা থাকবে। শিক্ষার্থীরা যে যখন খুশি আড্ডা দিবে, গল্প করবে, গান গাইবে, তর্ক করবে, প্রেম করবে। প্রশাসন বা ক্ষমতাসীন কেউ মোর‍্যাল পুলিশিং করবে না।

১৩ঃ বিশ্ববিদ্যালয় কেন্দ্রীক যে কোন সিদ্ধান্ত (একাডেমিক কিংবা অবকাঠামোগত) শিক্ষার্থীদের সঙ্গে মত বিনিময় করে নেয়া হবে।

১৪ঃ বাজারি সাবজেক্ট না খুলে মৌলিক সাবজেক্টের উপর বেশি গুরুত্ব আরোপ করা হবে। শতবর্ষে এসেও “আরকিওলজি” সাব্জেক্ট নেই এই বিশ্ববিদ্যালয়ে! অথচ নামে বেনামে কত সাবজেক্ট!!

১৫ঃ এই বিশ্ববিদ্যালয় একাডেমিক পরিবেশ ক্ষতিগ্রস্থ না করে আপামরকে ধারণ করবে। বহিরাগত নামক একটা হীনমন্য প্রত্যয় স্থান পাবেনা বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষার্থীদের মনে।

সর্বোপরি এই বিশ্ববিদ্যালয় দেশের সকল কবি, সাহিত্যিক, লেখক, শিল্পী, দার্শনিককে ধারণ করবে।

এমন অসংখ্য চিন্তা খেলা করে যায়। প্রত্যাশা করি আগামীর কোন এক বৃষ্টি মুখর সন্ধ্যায় সর্বজনের এই বিশ্ববিদ্যালয়ে আমি আপনি আর অনাগত ভবিষ্যৎ হাত ধরে হাটবো পরস্পর।

(লেখক বাংলাদেশ ছাত্র ইউনিয়ন কেন্দ্রীয় সংসদের সাবেক সভাপতি, ফেইসবুক থেকে সংগৃহিত)

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