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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

লেবানন থেকে নিরুপায় হয়ে দেশের মাটিতে ফিরছেন প্রবাসী বাংলাদেশীরা

বণিক বার্তা: লেবাননের রাজধানী বৈরুত শহরের হামরা এলাকায় বসবাস করেন শরীয়তপুরের রফিকুল ইসলাম। গত ১০ বছর ধরে পরিচ্ছন্নতাকর্মী হিসেবে একটি কোম্পানিতে কাজ করছেন তিনি। বেতন পান ৯ লাখ লেবানিজ পাউন্ড, যা বাংলাদেশী মুদ্রায় প্রায় ৫৫ হাজার টাকার মতো। কিন্তু এ অর্থ দিয়ে এখন তিনি আর নিজের ভরণ-পোষণ করতে পারছেন না, দেশে টাকা পাঠানো তো দূরের কথা। গত দেড় বছরের বেশি সময় ধরে অব্যাহতভাবে মুদ্রাস্ফীতি ও লেবানিজ পাউন্ডের দরপতনের কারণে সমপরিমাণ মুদ্রা ভাঙালে তিনি পান ৬ হাজার টাকার মতো, যা ৭০ থেকে ৮০ ডলারের মতো। দিন-রাত হাড়ভাঙা পরিশ্রম শেষে এত অল্প অর্থ আর এমন কষ্টের জীবন থেকে মুক্তি চান তিনি। নিরুপায় হয়ে দেশে জমি বন্ধক রেখে বিমান টিকিট কেনার সিদ্ধান্ত নিয়েছেন তিনি।

বৈরুতে রফিকুলের মতো এমন দুর্দশা সিংহভাগ বাংলাদেশীর। যারা এখন লেবানন ছাড়তে মরিয়া। ২০১৯ সালের মাঝামাঝি সময়ে রাজনৈতিক অস্থিরতা শুরু হলে ভঙ্গুর অবস্থায় পড়ে সেদেশের অর্থনীতি। এরই মধ্যে মুদ্রাস্ফীতি ও সর্বশেষ বৈরুত বন্দরে বিস্ফোরণের পর নাজুক অবস্থার মধ্যে পড়ে মধ্যপ্রাচ্যের দেশটি। এমন অবস্থায় সেখানে থাকা প্রবাসীরা পড়েন নানা সংকটে। লেবানিজ মুদ্রায় আগের মতো বেতন হলেও সেই অর্থ দিয়ে জীবনযাপন করতে পারছেন না তারা। বিরূপ পরিস্থিতিতে টিকতে না পেরে বহু প্রবাসী সাগরপথে অবৈধভাবে ইউরোপের পথ ধরছেন।

সঠিক হিসাব না থাকলেও প্রবাসীদের দেয়া তথ্য অনুযায়ী লেবাননে বর্তমানে বৈধ-অবৈধ মিলিয়ে ১ লাখ ২০ হাজারের মতো বাংলাদেশী রয়েছেন। তাদের বেশির ভাগই পুরুষ। তারা দেশটিতে পরিচ্ছন্নতা ও নির্মাণ শ্রমিক হিসেবে কাজ করেন। আর নারীরা কাজ করেন গৃহকর্মী হিসেবে। পরিস্থিতির কারণে এসব পেশার কর্মীরা এখন আর দেশে পরিবারের কাছে কোনো অর্থ পাঠাতে পারছেন না। উল্টো তাদের নিজেদের জীবনধারণই অসম্ভব হয়ে উঠেছে। এমন পরিস্থিতিতে দেশে ফিরে আসতে চান তারা। এজন্য সরকারের সহায়তাও কামনা করছেন প্রবাসী বাংলাদেশীরা।

বর্তমানে ১ ডলার সমান দেড় হাজার লেবানিজ পাউন্ড। একজন বাংলাদেশী কর্মী কাজ করে মাসে বেতন পান ৯ লাখ লেবানিজ পাউন্ডের মতো, যা ৫৯৫-৬০০ ডলারের সমান। কিন্তু অব্যাহতভাবে মুদ্রাটির দরপতন হওয়ায় এর পরিমাণ ৭০-৮০ ডলারে ঠেকেছে। এ অর্থ দিয়ে একজন কর্মীর দেশটিতে টিকে থাকাই কষ্টসাধ্য।

লেবাননে অবস্থিত বাংলাদেশ দূতাবাস জানিয়েছে, রাজনৈতিক অস্থিরতায় দেশটির মুদ্রার মান তলানিতে ঠেকেছে। বিরূপ পরিস্থিতিতে টিকতে না পেরে প্রবাসীরা নিজ দেশে ফিরে যাচ্ছেন। বাংলাদেশীরাও এ পরিস্থিতির শিকার। দেশটিতে বাংলাদেশী কর্মীরা যান মূলত শ্রমিক ভিসা নিয়ে। সেখানে কাজ করে অর্থ উপার্জনের মাধ্যমে দেশে পরিবারের কাছে টাকা পাঠানোর জন্য বা মূলত সচ্ছলতার জন্যই তাদের এ লেবানন যাত্রা। কিন্তু পরিস্থিতি বদলে যাওয়ায় দেশে ফিরতে চান তারা। গত বছরের শেষ নাগাদ অন্তত ৩০-৩৫ হাজার বাংলাদেশী লেবানন ছেড়েছেন। করোনার কারণে দীর্ঘ সময় ধরে বিমান চলাচল বন্ধ থাকায় এ বছর খুব বেশি বাংলাদেশী দেশে ফিরতে পারেননি। চলতি বছরের ১৫ ফেব্রুয়ারি থেকে এখন পর্যন্ত ১৭টি বিশেষ ফ্লাইটে সাড়ে সাত হাজারের মতো বাংলাদেশী দেশে ফিরেছেন। বাংলাদেশী দূতাবাসে নাম নিবন্ধন করে স্বেচ্ছায় দেশে ফিরেছেন তারা। যাদের বেশির ভাগই ফিরেছেন কাজের অনুকূল পরিবেশ না পাওয়ায়। আবার অনেক শ্রমিক যারা অবৈধভাবে সেখানে বাস করছিলেন, তারা ফিরেছেন সরকার ঘোষিত সাধারণ ক্ষমার আওতায়।

লেবাননে বাংলাদেশ দূতাবাসের শ্রম কাউন্সিলর আব্দুল্লাহ আল মামুন বলেন, দূতাবাসে নিবন্ধন করা সব বাংলাদেশীকে আমরা দেশে ফেরত পাঠিয়েছি। অল্প কিছু বাকি আছে। যারা স্বেচ্ছায় দেশে ফিরে যেতে চান তাদের জন্য সুযোগ অবারিত রয়েছে। দেশে ফিরতে তাদের কোনো বাধা নেই।

এর আগে ২০১৯ সালের অক্টোবরে দেশটিতে রাজনৈতিক অস্থিরতা শুরু হলে সেই সময়ই অনেকে দেশে ফিরে আসেন। অন্তত ১১ হাজারের মতো বাংলাদেশী দেশে ফেরেন।

লেবাননে বসবাসরত গণমাধ্যমকর্মী বাবু সাহা বলেন, বিপুলসংখ্যক বাংলাদেশী কর্মী দেশে ফিরতে চান। মূলত লেবানিজ পাউন্ডের মান কমে যাওয়া ও ডলার সংকটের কারণেই কেউ আর সেখানে থাকতে আগ্রহী নন। কাজ করে যদি নিজের ভরণপোষণই করতে না পারেন, তাহলে তো থাকা যায় না। অন্যদিকে দেশে থাকা পরিবারের সদস্যরাও চরম দুর্দশাগ্রস্ত। অনেকে দেশ থেকে টাকা এনে বিমানভাড়া দিয়ে ফিরছেন। আর যাদের সে উপায় নেই, তারা অসহায়ের মতো জীবনযাপন করছেন।

লেবানন থেকে একজন প্রবাসীর দেশে ফিরতে হলে বাংলাদেশী টাকায় প্রায় ৩৪ হাজার টাকা উড়োজাহাজ ভাড়া পরিশোধ করতে হয়। কিন্তু লেবাননের বর্তমান প্রেক্ষাপটে এ অর্থ জোগাড় করার ক্ষমতা সিংহভাগ কর্মীর নেই। একজন কর্মীকে বিমানভাড়া জোগাড় করতে হলে আরো সাত-আট মাস কাজ করতে হবে বলে জানান সেখানকার প্রবাসীরা। সে কারণে বিমান ভাড়ার ক্ষেত্রে সরকারি সহায়তা চান তারা। এজন্য প্রবাসী কল্যাণ ও বৈদেশিক কর্মসংস্থান মন্ত্রণালয়ের দৃষ্টি আকর্ষণ করেছেন লেবানন প্রবাসী শ্রমিকরা।

প্রবাসীদের এমন দুর্দশার বিষয়ে ব্র্যাকের অভিবাসন বিভাগের প্রধান শরিফুল হাসান বলেন, লেবাননের বর্তমান পরিস্থিতি একটি বাস্তবতা। এটি আরো দুই বছর আগে থেকে শুরু হয়েছে। কেবল বাংলাদেশীরাই নন, সেখানে থাকা সব দেশের প্রবাসীরা এ পরিস্থিতির সম্মুখীন। যেসব প্রবাসী ফেরত আসছেন, তাদের আপাতত নিজ উদ্যোগেই ফিরে আসতে হবে। কেননা বিপুলসংখ্যক প্রবাসীকে দেশে ফিরিয়ে আনতে হলে প্রচুর অর্থের প্রয়োজন। তবে সরকার চাইলে বিমানভাড়া বাবদ কিছু ভর্তুকি দিতে পারে বলে মনে করেন শরিফুল হাসান। এছাড়া প্রবাসী কল্যাণ ব্যাংক থেকে ঋণসহায়তা দিয়ে তাদের কর্মসংস্থানের ব্যবস্থা করার বিষয়েও পরামর্শ দেন তিনি।

জনশক্তি কর্মসংস্থান ও প্রশিক্ষণ ব্যুরোর তথ্য অনুযায়ী, এখন পর্যন্ত বৈধভাবে লেবাননে গেছেন ১ লাখ ৬৭ হাজার বাংলাদেশী। মূলত ২০০৯ সাল থেকে দেশটিতে বাংলাদেশী শ্রমিকরা অধিক হারে যাওয়া শুরু করেন। গত দুই বছরে দেশটির অর্থনৈতিক মন্দা ও করোনা পরিস্থিতিতে ফ্লাইট বন্ধ থাকায় তেমন কেউ যাননি। সর্বশেষ ২০২০ সালে ৪৮৮ জন ও ২০২১ সালে মাত্র ৬৩ জন বাংলাদেশী দেশটিতে গেছেন।

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