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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

বাংলাদেশে ব্যবসায়ী মাড়োয়ারি পরিবারের সংখ্যা এখন ৫০০

বণিক বার্তা: রাজস্থানের মরু অঞ্চল থেকে গোটা উপমহাদেশে ছড়িয়ে পড়েছিলেন মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীরা। সবখানেই সুনাম অর্জন করেছেন ব্যবসায়ী হিসেবে। এ সুনাম ও পারিবারিক ব্যবসার ঐতিহ্যকে কাজে লাগিয়ে অর্থনৈতিকভাবে সমৃদ্ধ হয়ে উঠেছেন তারা। বর্তমানে উপমহাদেশের সবচেয়ে বড় পারিবারিক কনগ্লোমারেটগুলোর অধিকাংশই মাড়োয়ারিদের। গোটা দক্ষিণ এশিয়াতেই পারিবারিক ব্যবসার বড় দৃষ্টান্ত তৈরি করেছে বিড়লা, বাজাজ, গোয়েঙ্কা ও ডালমিয়া পরিবার।

মাড়োয়ারিদের ব্যবসার প্রধান কেন্দ্র এখন ভারত। একসময়ে পূর্ববঙ্গ তথা বাংলাদেশও হয়ে উঠেছিল তাদের ব্যবসার অন্যতম বড় ক্ষেত্র। ইতিহাস বলছে, মোগল আমলেও এ দেশে মাড়োয়ারিরা ব্যবসা করেছেন। নবাবি আমলে গোটা বাংলা, বিহার ও উড়িষ্যার টাঁকশাল ও ব্যাংকিং ব্যবসায় একচ্ছত্র অধিকার প্রতিষ্ঠা করেছিলেন মাড়োয়ারি ব্যবসায়ী জগেশঠ। বলা হয়, বঙ্গে মারাঠা দস্যুদের হামলার প্রধান লক্ষ্য ছিলেন প্রতিষ্ঠিত মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীরা। তবে এ দেশে মাড়োয়ারিদের ব্যাপক হারে আগমন হয় ঊনবিংশ শতাব্দীর শুরুর দিকে। ওই শতকের প্রথম চার-পাঁচ দশকের মধ্যেই এ অঞ্চলের অর্থনীতির বড় নিয়ন্তা হয়ে ওঠেন তারা। ব্যাপক হারে ছড়িয়ে পড়েন ঢাকা, চট্টগ্রাম, খুলনা, নওগাঁ ও ময়মনসিংহে। হয়ে ওঠেন এ দেশের অর্থনীতি ও বাণিজ্যের বড় অংশীদার।

তবে কালের পরিক্রমায় বাংলাদেশে এখন আর আগের মতো মাড়োয়ারিদের দেখা যায় না। মাড়োয়ারিসহ বিভিন্ন সূত্রে পাওয়া তথ্য অনুযায়ী, বাংলাদেশে এখন এ সম্প্রদায়ের পরিবার রয়েছে সব মিলিয়ে ৫০০-এর মতো। এর আগে তিন দফায় ব্যাপক সংখ্যায় দেশ ত্যাগ করেছে মাড়োয়ারিরা। প্রথম দফায় তারা পূর্ববঙ্গ ছেড়েছিল দেশভাগের সময়ে। দ্বিতীয় দফায় ১৯৬৫ সালে ভারত-পাকিস্তান যুদ্ধের সময় তাদের বড় একটি অংশ এ দেশ ছেড়ে চলে যায়। স্বাধীনতা যুদ্ধের সময়েও বাংলাদেশ ত্যাগ করেছে আরো অনেক মাড়োয়ারি পরিবার। এর পরও অনেকের বাংলাদেশ ছেড়ে যাওয়ার ঘটনা ঘটেছে। তার পরও যারা থেকে গিয়েছে, তারা হয়ে পড়েছে পুরোদস্তুর বাংলাদেশী। নিজেদের স্থানীয় হিসেবেই পরিচয় দিতে বেশি স্বাচ্ছন্দ্য বোধ করে তারা। একই সঙ্গে অবদান রেখে চলেছে দেশের অর্থনীতিতেও।

বর্তমানে মাড়োয়ারি পরিবারগুলো ঢাকা, জয়পুরহাট, খুলনা, চট্টগ্রাম, কুষ্টিয়া, দিনাজপুর, বরিশাল, রাজশাহী, সৈয়দপুরসহ দেশের বিভিন্ন স্থানে ছড়িয়ে ছিটিয়ে রয়েছে। পাট, ধান-চাল, আখ, শিপিং, রিটেইলিংসহ বিভিন্ন ট্রেডিংনির্ভর ব্যবসাতেই নিয়োজিত রয়েছে তাদের বেশির ভাগ। ভারতসহ অন্যান্য স্থানে মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীরা শিল্পোদ্যোক্তা হিসেবে অগ্রসর ভূমিকা নিলেও দেশের শিল্প খাতে তাদের অংশগ্রহণ অনেক কম।

ভারতে মাড়োয়ারি বিনিয়োগে অনেক বড় বড় ব্র্যান্ড প্রতিষ্ঠিত হয়েছে। বিড়লা, আইডিয়া, বাজাজ, এসসার, ইমামি, ফ্লিপকার্ট ইত্যাদি বড় বড় ব্র্যান্ডের মালিকানা মাড়োয়ারিদেরই। বাংলাদেশে উত্তরা গ্রুপ অব ইন্ডাস্ট্রিজ ও দোয়েল গ্রুপ ছাড়া মাড়োয়ারি সম্প্রদায়ের শিল্প খাতে উল্লেখযোগ্য বিনিয়োগ তেমন একটা দেখা যায় না। বরাবরই তাদের মধ্যে ট্রেডিংনির্ভর ব্যবসার আগ্রহ দেখা গিয়েছে বেশি।

২০০ বছরের বাণিজ্যিক ইতিহাসে মাড়োয়ারি বণিকদের শিল্প খাতের চেয়ে ট্রেডিংনির্ভর ব্যবসার প্রবণতা বেশি থাকার কারণ সম্পর্কে জানতে চাইলে দোয়েল গ্রুপের ব্যবস্থাপনা পরিচালক অশোক কেজরিওয়াল বলেন, শিল্প করতে হলে সাহসের প্রয়োজন। ঝুঁকি নেয়ার হিম্মত না থাকার কারণেই আমাদের মাড়োয়ারি সম্প্র্রদায়ের বণিকরা শিল্প গড়তে পারেননি। বাংলাদেশে আমাদের দোয়েল ও উত্তরা গ্রুপ অব ইন্ডাস্ট্রিজ ছাড়া আর কোনো মাড়োয়ারি ব্যবসায়ী শিল্প করেছেন বলে আমার জানা নেই।

কুষ্টিয়ার মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীদের মধ্যে সামনের সারির একজন অজয় সুরেকা। দীর্ঘ ৫৬ বছর ধরে এখানে ইউনিলিভারের পরিবেশক হিসেবে ব্যবসা করছেন তিনি। তার মতে, ঠিক সাহস নয়, ভিন্ন কারণে মাড়োয়ারি সম্প্রদায়ের বণিকরা এ দেশে শিল্প গঠনের দিকে ঝোঁকেননি। শিল্প করতে হলে ব্যাংক লোন নিতে হয়। কিন্তু লোন ব্যাপারটিই আমাদের পছন্দ নয়। আমরা পূর্বপুরুষদের থেকেই এ গুণটি পেয়েছি। ফলে দেখা গেছে, মাড়োয়ারি সম্প্রদায় শিল্পের চেয়ে ট্রেডিংনির্ভর ব্যবসাতেই ঝুঁকে পড়েছে বেশি। এটা অনেকটা জিনগত ব্যাপার।

জয়পুরহাট জেলায় মাড়োয়ারিদের সবচেয়ে সরব উপস্থিতি দেখা যায়। জেলার বড় বড় ব্যবসায়ীর অধিকাংশই মাড়োয়ারি। সদরে মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীদের একটি আলাদা এলাকাই রয়েছে, যা মাড়োয়ারি পট্টি হিসেবে পরিচিত। এখানকার রাজ বস্ত্রালয় নামের একটি ব্যবসা প্রতিষ্ঠানের স্বত্বাধিকারী মনোজ কুমার আগরওয়ালা জানালেন, জেলায় মাড়োয়ারিরা দীর্ঘদিন ধরেই ব্যবসা করে আসছে। স্থানীয়দের সঙ্গেও মিশে গিয়েছে পুরোপুরি।

জেলার মাড়োয়ারি ব্যবসায়ীরা সাধারণত পণ্য আমদানি-রফতানি, কাপড়, নিত্যপণ্যের পাইকারি ব্যবসা ও ইস্পাত শিল্পের সঙ্গে জড়িত। এমনকি এখানকার সবচেয়ে বড় ঠিকাদার হিসেবে পরিচিত কালীচরণ আগরওয়ালও একজন মাড়োয়ারি ব্যবসায়ী। তিনি জানালেন, মাড়োয়ারি হিসেবে ঠিকাদারি ব্যবসা চালাতে গিয়ে কখনই কোনো ধরনের অসুবিধায় পড়তে হয়নি তাকে।

কালীচরণ আগরওয়াল জেলার শীর্ষ তিন কর ও ভ্যাটদাতার একজন। এ তালিকার বাকি দুজনও মাড়োয়ারি সম্প্রদায়ভুক্ত। তারা হলেন কাপড় ব্যবসায়ী রাধেশ্যাম বস্ত্রালয়ের স্বত্বাধিকারী সজন কুমার জাজেদিয়া ও মেসার্স শর্মা সুইটসের স্বত্বাধিকারী হরগোপাল শর্মা ।

জয়পুরহাট চেম্বারের পরিচালক ওম প্রকাশ আগরওয়াল এখানকার ব্যবসায়ী মহলে বিশিষ্ট স্থান নিয়ে আছেন। তিনি বলেন, এখানকার সব ধরনের বৈধ ব্যবসাতেই আমাদের উপস্থিতি রয়েছে। সরকারকে নিয়মিত ট্যাক্স-ভ্যাট পরিশোধ করে আমরা আমাদের ব্যবসা পরিচালনা করে আসছি।

এ দেশে বসবাসকারী মাড়োয়ারিরা বলছেন, নিজেদের এখন তারা বাঙালি হিসেবে ভাবতেই বেশি ভালোবাসেন। ব্যবসায়ীদের শীর্ষ সংগঠন এফবিসিসিআইয়ের পরিচালক ও বাংলাদেশ জুয়েলার্স সমিতির (বাজুস) সাধারণ সম্পাদক দিলীপ কুমার আগরওয়ালা বলেন, এখন আমাদের প্রধান পরিচয় আমরা বাঙালি। স্বাধীনতা যুদ্ধে আমাদের পরিবার সরাসরি অংশ নিয়েছে। আমার নানাসহ তার সাত ভাইকে পুড়িয়ে মারা হয়েছে। আমার জানামতে মাড়োয়ারিরা কোনো বৈষম্য কিংবা প্রতিবন্ধকতার শিকার হচ্ছে না।

ডায়মন্ড ওয়ার্ল্ডের ব্যবস্থাপনা পরিচালক এ ব্যবসায়ী বলেন, মাড়োয়ারিরা ব্যাংকঋণ খুবই অপছন্দ করে। আমার নিজেরও কোনো ব্যাংক লোন নেই। তবে এ কথা ঠিক মানতে পারছি না, মাড়োয়ারি বণিকরা শিল্প গড়েননি। হাতে গোনা কিছু শিল্প আমরা গড়ে তুলেছি, তবে তা তেমন ব্যাপক আকারে হয়ে ওঠেনি।

কুষ্টিয়ার ব্যবসায়ী অজয় সুরেকাও বলেছেন, বাংলাদেশের ক্ষুদ্র সম্প্রদায়গুলোও বৈষম্য তো দূরে থাক, বরং ক্ষেত্রবিশেষে সাধারণ নাগরিকের চেয়ে অনেক বেশি সুবিধা ভোগ করছে। মাড়োয়ারি সম্প্রদায় কোথাও প্রতিবন্ধকতার শিকার হয়েছে এমন কথা কানেও শুনিনি, চোখেও দেখিনি।

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