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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

করোনা হাসপাতাল থেকে বলছি: সোহেল রানা ভুঁইয়া

সোহেল রানা ভুঁইয়া:: করোনার সাথে আমার দেখা হয়েছিলো দুই বার। প্রথম ধাপে ২০২০ সালের জুন মাসে,তারপর এবার মে মাসে। এবার অবশ্য আমার মেয়ে ছাড়া পরিবারের চারজন আক্রান্ত হয়েছিলাম একসাথে। আল্লাহর অশেষ কৃপায় কোনোবারই হাসপাতাল পর্যন্ত যেতে হয়নি, বাসায় চিকিৎসা করেই পার পেয়েছিলাম। করোনায় আক্রান্ত হয়েছি,মনে ভয় কাজ করেছে ঠিকই। তবে করোনা হলে ভয়াবহতা কী পর্যন্ত হতে পারে সেটার সরাসরি ধারণা আমার গতকাল পর্যন্ত ছিলোনা।

গতকাল পর্যন্ত ছিলোনা বলছি এজন্য যে গত পরশু গভীর রাত থেকে আমার ৮ বছর বয়সী মেয়েকে নিয়ে আমি নিজেই আছি ঢাকার ডিএনসিসি কোভিড ডেডিকেটেড হাসপাতালে। পরশুদিন দুপুরে দেখলাম মেয়ের টেম্পারেচার হাই (১০০°+)! সাথে সাথে নাপা খাওয়ালাম। ঘন্টাখানেকের মধ্যে জ্বর কমে গেলো। বিকেলের দিকে আবারও জ্বর উঠতে লাগলো। পোষা খরগোশ নিয়ে নিয়মিত বিকেলের খেলা শেষে বাসায় গেলো। মাগরিবের নামাজ শেষে আমাদের সাথে বসেই গল্প করছিলো। ০৭.৪৫ এর দিকে বললো বাবা খারাপ লাগছে।ভাবলাম জ্বর, তাই হয়তো খারাপ লাগছে। ৫ মিনিট পার না হতেই বললো বাবা আমার মনেহচ্ছে শ্বাস নিতে কষ্ট হচ্ছে! তখন ভাবলাম হয়তো বমির ভাব হচ্ছে, তাই এমন লাগছে। মুহূর্তেই চিৎকার দিয়ে উঠলো বাবা আমি শ্বাস ফেলতে পারছি না, বুকে কষ্ট হচ্ছে অনেক! তখন দিগ্বিদিক জ্ঞান শূন্য হয়ে মেয়েকে কোলে নিয়ে নিলাম, অক্সিমিটার লাগিয়ে দেখি অক্সিজেন সেচুরেশন ৭৫! ভাবলাম মেশিন ইরর! তারপর খুলে আবারও কয়েকবার লাগানোর পরও দেখি ৮০ ক্রস হয় না! মেয়ের চিৎকার বন্ধ হয়ে আসছিলো, বলছিলো বাবা আমার শ্বাস বন্ধ হয়ে গেলো! তখন মেয়েকে কোলে নিয়ে দুতলা থেকে দৌড়ে রাস্তায় নেমে আসলাম। তখন যে আমাদের মনের অবস্থা কী হয়েছিলো সেটা কিছুতেই বর্ণনা করা সম্ভব নয়! এখনো সে সময়ের কথা মনে এলে বুক ধরফর শুরু হয়ে যায়! ৫/৭ মিনিট দূরত্বে থাকা সদর হাসপাতালের পথ যেন শেষই হচ্ছিলো না! হাসপাতালে পৌঁছে নেবুলাইজ,অক্সিজেন, ইনজেকশন দেওয়ার পর মেয়ের কষ্ট অনেকটা কমলো, সেচুরেশনও একটু বাড়লো। অক্সিজেন সাপোর্টে রাখা হলো।ব্রাহ্মণবাড়িয়াতে রাখাটা আমাদের জন্য ঝু্ঁকিপূর্ণ তাই ঘটনার আদ্যোপান্ত জানা প্রিয় ছোট ভাই ডা. Mahabubur Rahman Amil এবং সদর হাপাতালের কনসালট্যান্ট বন্ধুবর ডা. Towhid Ahamed এর পরামর্শে মেয়েকে আমরা জরুরি ভিত্তিতে তখনই ঢাকায় নিয়ে আসি। ভর্তি হই মহাখালীস্থ ডি এন সিসি ডেডিকেটেড কোভিড-১৯ হাসপাতালে ( হাসপাতালের খোঁজ এবং হাসপাতাল পর্যন্ত পৌঁছা নিয়ে পরে লিখবো আশাকরি )। ভর্তির রাত থেকেই পদে পদে নতুন অভিজ্ঞতার পালা যেনো আজো শেষ হচ্ছে না!

রাতে ভর্তি হলাম যে ওয়ার্ডে /রুমে সেখানে ১০ বেডের মধ্যে পেশেন্ট শুধু আমরাই, সন্ধ্যা হতেই আমাদের রুম ভরেগেলো।তারপর দিন আশপাশের রুমের সব বেডও ফিলাপ! তারপরও রোগী আসছেই! এতো হাহাকারে মাঝে দুটি কেইস আমার মনে সারাক্ষণ ই কোনো না কোনো ভাবেই মারাত্মক প্রভাব ফেলেছে, এটা সহজেই বুঝতে পারছি।

কেইস -১
পাশের ওয়ার্ডের রোগীদের মাঝে সুঠাম,সুদর্শন এক রোগী আছে,বয়স ৩২-৩৫ বছরের বেশি হবে না। জানলাম চাকুরিও করে একটি এমএনসি’র ভালো পদে, নাম সাদমান। আমি প্রায়সময়ই তাকে দেখার জন্য করিডোরে গিয়ে দাঁড়িয়ে থাকি। কালও দুপুরের পর গিয়ে দাঁড়ালাম। অক্সিমিটারে নজর যেতেই দেখি অক্সিজেন সেচুরেশন ৬০ থেকে ক্রমশও নিচেই নামছে! নিজের অজান্তেই জোর শব্দে বলেউঠলাম উনাকে তো আইসিইউতে পাঠানো উচিত ইমার্জেন্সি! একজন বললেন আইসিইউ ম্যানেজের চেষ্টা চলছে, আপাতত হাইফ্লোতে চেষ্টা করা হবে কন্ট্রোলের। হাই ফ্লো মেশিন লাগিয়ে ৮০ লিটার ফ্লো দেওয়া হলো! তারপরও স্যাচুরেশন ৩৫ এর উপরে উঠছে না। তখন নিজেকে কন্ট্রোল রাখতে পারলাম না, একজন ওয়ার্ড বয়কে সাথে নিয়ে উপুর করে শোয়ার পর পিঠে প্রেশার দেয়ার পর মুহূর্তেই ৯০ এ উঠে গেলো সেচুরেশন। সবার মুখে স্বস্তির হাসি। বললাম এটা স্ট্যাবল থাকবে না, আইসিইউর ব্যবস্থা ছাড়া উপায় নেই। হঠাৎ ৪০ এ নামলো আবসর! তারপরও উনাকে আরো কিছুক্ষণ হাইফ্লো অক্সিজেন দিয়ে এক্সপিরিমেন্ট করতে চাইলেন হাসপাতাল পরিচালনায় যুক্ত একজন সেনা অফিসার (নারী)! স্বজনদের বললাম ভাই সময় নষ্ট করার মানে হয় না,তারাতারি করেন যা করার। যাহউক আই সি ইউ ম্যানেজ হলো, তাকে নেয়া হলো।এখন সেচুরেশন ৯০-৯৬ এর মধ্যেই থাকছে আলহামদুলিল্লাহ! আমার রুমে ফিরে দেখি কর্নারের বেডের অক্সিজেন দেওয়া ষাটোর্ধ্ব রোগী মুরুব্বি মহিলা একা একা বসে কাঁদছেন,কাছে কেহ নেই! জিজ্ঞেস করলাম কোনো সমস্যা হচ্ছে আপনার? হু হু করে কেঁদে বললো বাবা ও আমার ছেলে! কিছু বলার ভাষা হারিয়ে ফেললাম! আর নিজের ভেতরটাশ কেমন যে খারাপ লাগছিলো সেটা বুঝানো আসলেই সম্ভব না। উনাকে শান্তনার বাণী শুনালাম,বললাম আল্লাহর উপর আস্থা রাখুন প্লিজ।উনি মোটামুটি শান্ত হলেন। কথাপ্রসঙ্গে জানলাম উনাদের বাড়ি ও ব্রাহ্মণবাড়িয়া শহরেই, থাকেন ঢাকায়। ঠিকানা জিজ্ঞেস করার পর দেখলাম আমাদের অতি পরিচিত এবং পুরাতন বনেদি একটি বাড়ির মালিক উনারা ছেলের অক্সিজেন লেভেল ৯০ এর উপরে উঠেছে শুনে দেখলাম উনার অক্সিজেন লেভেলও ৮৮/৮৯ থেকে ৯৫/৯৬ এ উঠেছে!

কেইস-২
আমার ঠিক আগের বিছানায় নরসিংদির একজন ৫০ পঞ্চাশ ঊর্ধ মহিলা রোগী। অক্সিজেন সহায়তায় সেচুরেশন ৯০-৯৬/৭ এ উঠানামা করে। কথা প্রসঙ্গে উনাদের সম্পর্কে যা জানলাম তা করুণতম বললেও ভুল হবে না! উনার কমপ্লিকেশন থাকায় তিন তিনেক আগে কোভিড টেস্ট করিয়ে রিপোর্ট পান পজেটিভ! সম্ভবত তার পর দিনই উনার স্বামী শ্বাসকষ্ট নিয়ে হঠাৎ খুবই অসুস্থ হয়েপড়ে! অক্সিজেন সহায়তায় এম্বুলেন্স করে নরসিংদী বাবুরহাট থেকে ঢাকার উদ্দেশ্যে রওয়ানা হয়ে আর পৌঁছাতে পারেন নি! পথেই শেষ নিঃস্বা ত্যাগ করলেন। নিঃসন্দেহে বলা ই যায় যে এটা কোভিড ডেথ কেইস। যদিও ষাট বছর বয়সী ব্যক্তিটির কোনো শারিরীক জটিলতা ছিলো না। আরো মর্মান্তিক লাগলো যখন শুনলাম ডেড বডি নামিয়ে বাড়িতে নিয়ে গেলো, আর উনাকে (মহিলা) ঐ এম্বুলেন্সে করেই ঢাকায় পাঠালো।তারপর ভর্তি হলো ডিএনসিসি কোভিড হসপিটালে আমাদের পাশের বিছানায়।
ভাবি কি মর্মান্তিক বিষয়! স্বামী হারানের শোকটাও নিজেরমতো করে পালনের সুযোগও পেলেন না তিনি! কী অদ্ভুত নির্মম নিয়তি! উনার দেখাশোনা করছেন উনার বড় (চিকিৎসক) মেয়ে। শুনলাম ছোটো মেয়েও অক্সিজেন সাপোর্ট নিয়ে আছে। বললাম নিয়ে আসেন এখানেি এডমিট করিয়ে দিবো ( যদিও কোভিড রিপোর্ট নেই তার)। ওরা আসলো,আমাকে জানাতে ভুলে গিয়েছিলো, কর্তৃপক্ষের মন গলাতে পারেনি, ভর্তি হলো ইমপালস হসপিটালে এডমিট । সামান্য একটু ভুল/বেকামি না করলে ডিএনসিসি হসপিটালে মায়ের রুমেই তুলে দিতে পারতাম মেয়েটাকে। তাদের অনেক সুবিধা হতো। উনার দিকে তাকালে বুকটা কেমন যেন কেঁদে উঠে! এতোবছর এক ছাদের নিচে সংসার করলো অথচ বাড়ি থেকে উনার স্বামীর শেষ বিদায়টা দেখার সুযোগ হলো না! নিয়তি বড় অদ্ভুত, আপন মর্জিতে চলে।

লিখার ফাকেই রাত সাড়ে বারোটায় মুনতাহার কোভিড ( RT-PCR) রিপোর্টের ম্যাসেজ আসলো। কোভিড-১৯ পজেটিভ! মেয়ের এক্সরে রিপোর্টে লাং ইনফেক্টেড পেয়ে আজ দুপুর সাড়ে ১২ টায় আইসিডিডিআরবি তে স্যাম্পল দিয়েছিলাম, ১২ ঘন্টা পর রিপোর্ট আসলো। যদিও তার রেপিড টেস্টে নেগেটিভ ফল এসেছিলো গত পরশু দিন।

আমার মেয়ের অবস্থার আকস্মিক অবনতি, আইসিইতে থাকা সাদমান এবং নরসিংদী থেকে আসা প্যাশেন্টেকে আক্রমণের ধরন দেখলে সহজেই অনুমান করা যায় যে এটা ক্ষতিকর ডেল্টা ভেরিয়েন্টের কোভিড ছাড়া আর কিছু নয়।

আমারটি ছাড়া উল্লেখিত দুটি কেইসেই লক্ষণীয় যে একই সাথে পরিবারের একাধিক সদস্য করোনা আক্রান্ত এবং কারো অবস্থা ই সাধারণ নয়; আইসিইউ, অক্সিজেন সাপোর্ট নিতেই হচ্ছে। আর একজন তো মরেই গেলো বুঝার আগেই! ঘটনাগুলো মিলালে এটা দাঁড়ায় যে আমার পরিবারে আমার মেয়ে আক্রান্ত হলো, অক্সিজেন সাপোর্টও দিতে হলো! আর যেহেতু তার পাশে সার্বক্ষণিক আমি ও মেয়ের মা আছি,আমরাও মনে হয়না এই ডেল্টা কেভিড সংক্রমণ থেকে বাদ যাবো! তাছাড়া বাসায় যারা ছিলো তাদের জন্যও ভাবনা হচ্ছে। কারণ বাসার সদস্যদের মধ্যে সিনিয়র সিটিজেন মেয়ের দাদা ( ৭৮ বছর), মেয়ের নানু (৬৬ বছর) এবং আরেকজন নানু (৬৫ বছর) ছিলো!

আর আমাদের কেহ এফেক্টেড হলে কী হবে জানি না! আমি আর ওর মা আছি কোভিড ইউনিটে, বলাযায় কোভিড বেমার মাঝে আমাদের অবস্থান! কোভিড এভয়েড করার সুযোগ খুবই কম, বাকিটা আল্লাহ জানেন।আমার অবশ্য অলরেডি কিছু নমুনা ইতিমধ্যেই প্রকাশ পেয়েছে, বাকিটা স্যাম্পল পরীক্ষা করলে বুঝা যাবে।

সব মিলিয়ে পুরো হসপিটাল জুড়ে ইমার্জেন্সি গেট, লিফ্ট,করিডোর, ওয়ার্ড, আইসিইউ সহ সব জায়গায় যে চিত্র দেখলাম এই দুই দিনেই, তাতে সহজেই বলা যায় যে করোনা আমাদের সহজেই ছাড়ছে না। আর এমন চিত্র নাকি দেশব্যাপী সকল করেনা হাসপাতালের ই।মনোবল ঠিক রাখাটা খুবই দুঃসাধ্য! প্রতিটি কোভিড হসপিটালে রোগী এবং এটেন্ডেন্টদের জন্য কাউন্সেলিং এর জন্য ক্লিনিক্যাল সাইকোলজিস্ট নিয়োগ হয়তো বাধ্যতামূলক হয়ে যাবে অদূর ভবিষ্যতে।কারণ করেনার এই ভয়াবহতা গুলো খুবই হৃদয়বিদারক। করেনায় নিজে না ভুগলে এবং স্বচক্ষে প্রত্যক্ষ না করলে ভয়াবহতা এবং ক্ষতি আঁচ করার মতো নয়।
আল্লাহ রহম করুন।এছাড়া উপায় নেই।

সাবধানে থেকেও করেনামুক্ত থাকা যাচ্ছে না। তারপরও সাবধানতার বিকল্প নেই। আর এটা ধরা মানেই খুব দ্রুত খারাপ করে ফেলা! দেশে ডেল্টা ভেরিয়েন্ট এখন প্রায় ৮০% এফেক্টেড মানুষের শরীরে। পরিবারের একজনকে ধরা মানে কোথায় এর শেষ সেটা শেষ না হওয়া অব্দি ধারণা করা সম্ভব নয়।

আল্লাহ আপনি আমাদের সবাইকে ক্ষমা করেদিন। সহায় হোন আমাদের প্রতি।

 

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