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প্রচ্ছদ

সর্বশেষ খবর :

শামীম আহমেদ: ভালো বাবা, মন্দ বাবা

শামীম আহমেদ: আমার ফেসবুকের অধিকাংশ মানুষের সাথেই আমার কখনও দেখা হয় নাই। এমনকি যারা আমাকে বন্ধু বন্ধু সম্বোধন করে কমেন্ট করেন, আন্তরিকভাবে ভালোবাসা জানান, তুই-তোকারি করেন, তাদের অনেকের সাথেও আমার কখনও দেখা হয় নাই। মানুষের সাথে আন্তরিক হবার জন্য, কাছের মনে করার জন্য অনেক সময় দেখা-সাক্ষাৎ করা লাগে না, আবার সারাদিন পাশে থেকেও একে অন্যের কাছের হয় না, সম্পর্ক অদ্ভুত একটা ব্যাপার।

যারা আমার খুব কাছের মানুষ বা মোটামুটি কাছের মানুষ তারাই শুধু নন, যাদের সাথে আমার কখনও দেখা হয়নি, কথা হয়নি, শুধু সামাজিক যোগাযোগ মাধ্যমে যোগাযোগÑ তারাও আমার আর আমার বাবার সম্পর্ক নিয়ে আমার কাছে মাঝে মাঝেই মুগ্ধতা প্রকাশ করেন। আমার বাবার ফেসবুকের ৫০ ভাগ পোস্ট হচ্ছে আমার লেখা। আমি কী করি, কই যাই, কই থাকি ইত্যাদি আমার ফেসবুক থেকে যতোটা না জানতে পারবেন, আমার বাবার ফেসবুক থেকে তার চাইতে বেশি জানতে পারবেন। আমার পরিচিত কয়েকজন আমাকে বলেছেন, আপনার আব্বার সাথে আপনার সম্পর্ক দেখলে খুব ভালো লাগে, হিংসাও হয়। কিন্তু আমাদের সম্পর্কটা সবসময় এমন ছিল না। অনেক বাবা-ছেলের মতোই আমি যখন বড় হওয়া শুরু করলাম, অর্থাৎ বয়স ১০-১২ বছর ছাড়ালো, টিন-এইজে উপনীত হলাম, আমি বলব আমার বাবার সাথে আমার সম্পর্ক শীতল হওয়া শুরু করল। আমার বাবা ছিলেন সরকারি চাকুরে। সৎ এবং একনিষ্ঠ চাকুরে। ফরজ নামাজ থেকে শুরু করে এশার নামাজ পর্যন্ত তার দিনের বেশির ভাগ সময় যেতো অফিসের চিন্তায়, অফিস থেকে ফাইল নিয়ে ভোরে কাজ করতেন, সন্ধ্যায় কাজ করতেন। অফিসের বাইরে তার সময় ছিল খুব কম।

এছাড়াও বছরের একটা বড় সময় সরকারি ট্যুরে নানা শহরে ঘুরে বেড়াতে হতো। আমরা যেমন এখন সন্তানের সঙ্গে সপ্তাহে একদিন বাইরে ঘুরতে যাওয়া, কয়েক বেলা একসঙ্গে খেতে বসা, মুভি দেখা, তাদের সঙ্গে গল্প করা, তাদের মানসিক স্বাস্থ্য নিয়ে আলাপ করাÑ ইত্যাদি বিষয়গুলো রুটিনমাফিক করি, আমাদের বাবারা তেমনটা করতেন না। আমার বাবার একটা বড় কাজ ছিলো প্রতি শুক্রবার পরীক্ষা নেওয়া। ৩ ঘণ্টার পরীক্ষা, বেশির ভাগ সময় গণিত। আমাদের কাছে ছোটকালে বাবা বিষয়টা ছিলো আতঙ্কে। মূলত স্কুলে কেমন করছি, পড়ালেখা হচ্ছে কিনা, পরীক্ষায় রেজাল্ট ভালো হচ্ছে কিনাÑ এসব বিষয়ের খবর নেওয়াই হচ্ছে বাবার কাজ।

বাবার সঙ্গে ঘুরতে যাব, খাব, গল্প করবো, প্রেম ভালোবাসা নিয়ে আলাপ করব, এগুলো ছিলো কল্পনার বাইরে। বছরে দুয়েকবার চাইনিজ খাবার খেতে যাওয়া আব্বা-আম্মার বিবাহবার্ষিকী উপলক্ষে, মাঝে মাঝে টুরে যাওয়ার সময় তার সঙ্গে গিয়ে মাইকেল মধুসূদন দত্তের বাড়ি দেখা, বাগেরহাটের সাত গম্বুজ মসজিদ দেখাÑ এগুলো ছিলো আমাদের জন্য বিরাট পাওয়া। আরেকটু বড় হলে জুম্মার নামাজে একসঙ্গে যাওয়া আর ভোর বেলা কয়েকমাস একসাথে হাঁটতে যাওয়ার কথা মনে পড়ে।

আমার আব্বা ঢাকা মেডিকেল কলেজ পাস ডাক্তার। আমি নটর ডেম কলেজ থেকে পাশ করে ভর্তি হলাম ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ের অর্থনীতি বিভাগে। স্বাভাবিকভাবেই তিনি খুশি হননি। তার সাথে আমার সম্পর্কের আরও অবনতি হলো। আমি ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে ক্লাস করতাম খুবই কম। ঢাকা বিশ্ববিদ্যালয়ে আমি কখনই নিজেকে খাপ খাইয়ে নিতে পারিনি। ওখানকার পড়ার পরিবেশ বা সার্বিক কোনোকিছুই আমার মন মতো ছিলো না। আমার বন্ধুরা বলতো, তোর নর্থ সাউথে পড়া উচিত ছিলো। আমি বিকেল পর্যন্ত ঘুমাতাম, আর সারারাত জেগে থাকতাম। লেখালেখি করতাম, চ্যাট করতাম, সৃজনশীল বুদ্ধিবৃত্তিক আতলামিতে ব্যস্ত ছিলাম। বেশির ভাগ দিন ভোরবেলা নাস্তা করে ঘুমাতে যাবার সময় আমার বাবার সাথে দেখা হতো, ওই সময় তিনি অফিসে যেতেন। আব্বা যখন অফিস থেকে ফিরতেন, আমি তখন ঘুম থেকে উঠে ব্রিটিশ কাউন্সিলে যেতাম।

তবে ক্লাস না করলেও মন্দ কোন কাজ করতাম না। নানা পত্রিকায় আমার লেখা ছাপা হতো সেই সময় থেকেই। নানা গবেষণাধর্মী প্রজেক্টে কাজ করে নিজের সব খরচ আমি চালাতাম ২০০০ সাল থেকে। বিশ্ববিদ্যালয় দ্বিতীয় বর্ষে পড়ার সময় ব্রিটিশ কাউন্সিলের দাওয়াতে ইংল্যান্ডে কনফারেন্সে যাই। বিশ্ববিদ্যালয়ের শিক্ষকদের সাথে আব্বার নানা মিটিংয়ে দেখা হলে তারা আমার প্রশংসা করতেন। আমার ভিন্ন চিন্তা এবং বিশ্লেষণ তাদের প্রভাবিত করত সেই সময় থেকেই।

আমার ধারণা আমার খাপছাড়া জীবনযাপনে একদিকে বাবা বিচলিত ছিলেন, অন্যদিকে আমার নানামুখী সৃজনশীল অর্জনে তিনি আমার ব্যাপারে পুরোপুরি আশাও ছেড়ে দিতে পারতেন না। এই যে বাবা-ছেলের মধ্যে দূরত্ব এটা বজায় ছিল আমার মেয়ের জন্ম হওয়া পর্যন্ত। আমার মেয়ের জন্মের পর থেকে আমার বাবার সাথে আমার সম্পর্কের উন্নতি হওয়া শুরু করে। আমাদের তিনজনের বয়স যত বেড়েছে, আমাদের সম্পর্কের গভীরতা তত বেড়েছে।

সম্পর্ক অনেকটা গাছের মতো। অনেক দিন ধরে গাছে পানি দিয়ে, সার দিয়ে, আগাছা উপড়ে তারপর ফুল ধরে, ফল ধরে। আমার বাবা আর আমার সম্পর্ক তেমনই। আমার আর আমার আব্বার সম্পর্ক এখন সবচেয়ে সুন্দর। আমি চার বছরের বেশী সময় ধরে ক্যানাডা থাকি। এই চার বছরের প্রায় প্রতিদিন আমার আব্বা-আম্মার সাথে আমার ফোনে কথা হয়েছে। ৪০ বছর বয়সী একজন মানুষের সাথে তার ৭৪ বছর বয়সী বাবার প্রতিদিন ফোনে কথা হয়, এটা একটা বিরল ব্যাপার। আমার সহকর্মী, আমার ছাত্ররা জানে বাংলাদেশ সময় রাত সাড়ে ১০টায় আমি আমার বাবা-মাকে ফোন করব, এই সময় তাদেরকে আমি সময় দিতে পারব না। আমাদের যে অনেক কথা হয় তাও না, কিন্তু প্রতিদিন কথা হয়। আমার খুব কম বন্ধুর তার বাবা মার সাথে সপ্তাহে একদিনের বেশী কথা হয়। সেদিক দিয়ে আমি সৌভাগ্যবান।

বাবা দিবসে বাবা নিয়ে সামাজিক যোগাযোগ মাধ্যমে চমৎকার সব লেখা পড়ি আমরা। কিন্তু সবার বাবা ভাগ্য এক হয় না। অনেকে জন্মের আগে, বা জন্মের পর পর বাবাকে হারিয়েছেন। অনেকে শিশুকালে বাবাকে হারিয়েছেন। বাবাকে হারিয়ে জীবনযুদ্ধে লড়াই করতে করতে আমাদের লেখা যখন তারা পড়েন, তাদের নিশ্চয় অনেক কষ্ট হয়, রাগ হয়। আমি তাদের কাছে ক্ষমা চেয়ে নিচ্ছি। আবার অনেকের বাবা শয়তানের চাইতেও খারাপ হয়। হুমায়ূন আহমেদ বলেছিলেন, সব স্বামী ভালো হয় না, কিন্তু সব বাবা ভালো হয় – এই কথাটি মোটেও সত্য নয়। অনেক বাবাই খারাপ হন, খুবই খারাপ হন। যারা জীবনে মন্দ বাবা পেয়েছেন, তাদেরও নিশ্চয় আমাদের লেখা পড়লে রাগ হয়, কষ্ট হয় – আমি তাদের কাছেও ক্ষমা চেয়ে নিচ্ছি।

আমার প্রোফাইলে যারা খুব তরুণ মানুষ আছেন, তাদের সাথে তাদের বাবার সম্পর্ক যদি মধুর না হয়, আমি বলব – ঐধহম রহ ঃযবৎব! আজকে হয়ত ভালো নয়, কিন্তু যখন তুমি পড়ালেখা শেষ করে চাকরি বাকরি করে বড় হবে, সেদিন হয়ত বুঝবে আজকের সম্পর্কের এই শীতলতা কেন। সেদিন যাতে তোমাদের সম্পর্ক মধুর হয়, তার জন্য অপেক্ষা করো, তোমার চেষ্টাটা চালিয়ে যাও। বাবা-মার গুরুত্ব ভালো সময়ে কম বোঝা যায়, তাদের গুরুত্ব বোঝা যায় খারাপ সময়ে, যখন পাশে আর কেউ থাকে না।

আর যারা বাবা হারিয়েছ, অথবা বাবা নিয়ে সন্তুষ্ট নও, তাদের বলব তোমরা নিজেরা এমনভাবে প্রস্তুত হও, যাতে আজ থেকে ৩০-৪০ বছর পর তোমাদের নিয়ে কেউ একজন এমন পোস্ট দেয়। তুমি হয়ত ভালো বাবা পাওনি, কিংবা বাবার সংগ পাওনি, কিন্তু তুমি একজন চমৎকার বাবা কিংবা মা হতে পারো কারো জীবনে – সেই সুযোগ হারাবে কেন? আরেকটা কথা, কিছুটা অনুশোচনা কথনও। আপনারা যারা সন্তানকে উচ্চশিক্ষার্থে বা নানা কারণে বিদেশে পাঠিয়ে দেন, তারা একটু প্রস্তুতি নিয়ে পাঠাবেন। বিদেশ একটা ট্র্যাপ। এই ট্র্যাপ থেকে কাউকে ফেরত পাওয়া কঠিন। সারাজীবন সন্তানের জন্য সবকিছু করবেন, কিন্তু শেষ বয়সে একা থাকবেন, তাদেরকে দূর থেকে দেখবেন – বিদেশ আপনার সন্তানকে এমন আহামরি কীইবা দেয়? সেটা কি আপনি দেশে তার জন্য করতে পারতেন না? আমি খুব সৌভাগ্যবান আমার বাবা-মা বেঁচে আছেন, সুস্থ আছেন। একজন মানুষ তার জীবনে যতটা ভালো বাবা-মা চাইতে পারেন, আমার বাবা-মা ঠিক ততটুকুই। আমি নিশ্চয় সৌভাগ্যবান, খুব খুব সৌভাগ্যবান। সবাই আমার বাবার জন্য দোয়া করবেন। আমার মা’র জন্য দোয়া করবেন। যাদের বাবা নেই, বা থেকেও নেই, তাদের জীবনও সুন্দর হোক।

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